
MP News :मध्य प्रदेश के जबलपुर में स्थित एमपी हाईकोर्ट में 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण से जुड़े मामलों की मैराथन सुनवाई सोमवार को भी जारी रही। जस्टिस आनंद पाठक व जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई इस सुनवाई में पूरे समय सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती ने पक्ष की दलीलें रखीं। दूसरी डिवीजन बेंच होने के कारण कोर्ट में बहस शाम 4 बजे तक ही चल सकी, जो अब मंगलवार दोपहर 2:30 बजे से दोबारा शुरू की जाएगी।
सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग के अधिवक्ता प्रदीप संचेती की ओर से राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि, डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय को सर्वे का काम आयोग की वर्ष 2022 की रिपोर्ट के आधार पर सौंपा गया था, लेकिन आयोग का गठन स्वतंत्र नहीं था, क्योंकि इसके तीनों सदस्य विधायक थे। नियमों के विपरीत अलग - अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व न होने से इसकी कार्यप्रणाली राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं मानी जा सकती।
अदालत को बताया गया कि वर्ष 1983 की महाजन आयोग रिपोर्ट के बाद किसी भी आयोग (राष्ट्रीय या मंडल आयोग) ने नया सामाजिक और शैक्षणिक डेटा एकत्र नहीं किया। इसके बावजूद सरकार ने 40 वर्ष पुरानी रिपोर्ट के आधार पर 2019 में संशोधन किया। केवल जनसंख्या के आधार पर आरक्षण बढ़ाना सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी फैसले की भावना के विपरीत है।
बहस में डॉ. भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी के 10 हजार लोगों (सभी ओबीसी) पर किए गए सर्वे के सीमित दायरे और एआईएसएचई (ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन) के राष्ट्रीय आंकड़ों का हवाला दिया गया। इस पर डिवीजन बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि यूनिवर्सिटी को सामाजिक स्थिति का अध्ययन करना था, तो केवल ओबीसी ही नहीं बल्कि सभी वर्गों का डेटा एकत्र करना चाहिए था ताकि निष्पक्ष तुलना संभव हो पाती। इसके अलावा लेबर फोर्स के आंकड़ों का हवाला देते हुए सामान्य वर्ग ने तर्क दिया कि रिपोर्ट में केवल ओबीसी के आधार पर अतिरिक्त आरक्षण की आवश्यकता साबित नहीं होती।