विपरीत परिस्थितियों में जहां आमजन बाहर निकलने में सोचते हैं, वहीं ये गिग वर्कर्स हंसते हुए लोगों को उनकी जरूरत का सामान, मनचाहा खाना, दवाएं आदि घर के दरवाजे तक पहुंचा रहे हैं।
gig workers :तेज बारिश हो, आग उगलता सूरज या फिर हाड़ कंपा देने वाली सर्दी…हर सीजन में समय पर सामान पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाने में गिग वर्कर्स निभा रहे हैं। विपरीत परिस्थितियों में जहां आमजन बाहर निकलने में सोचते हैं, वहीं ये गिग वर्कर्स हंसते हुए लोगों को उनकी जरूरत का सामान, मनचाहा खाना, दवाएं आदि घर के दरवाजे तक पहुंचा रहे हैं।
लाख खतरों के बावजूद न तो उन्हें सुरक्षा मिलती है और न ही जिसके लिए वो काम कर रहे हैं वे कंपनियां इन्हें कोई सुविधा प्रदान करती हैं। इसके बाद भी इन वर्कर्स की संख्या शहर में लगातार बढ़ती जा रही है। एक्सपट्र्स के अनुसार हर महीने करोड़ों का व्यापार इन्हीं वर्कर्स के भरोसे चल रहा है।
जानकारी के अनुसार शहर में दिनों दिन गिग वर्कर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले पांच सालों में ये बढकऱ दोगुनी लगभग 20 हजार के आसपास पहुंच गई है। इनमें युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। वहीं महिलाओं व युवतियों की संख्या करीब 2 हजार तक पहुंच गई है। जो चौबीस घंटे लोगों को सेवा मुहैया करा रहे हैं। एक्सपट्र्स के अनुसार जिस तरह से ऑनलाइन ऑर्डर देने और घर बैठे मार्केटिंग का चलन बढ़ रहा है, उससे आने वाले सालों में इनकी संख्या और बढ़ेगी।
त्यौहारी सीजन में जहां प्रतिदिन 10 करोड़ का व्यापार हो रहा है। ये पूरा बाजार आज पूरी तरह से गिग वर्कर्स पर निर्भर है। असंगठित गिग वर्कर्स पर जबलपुर जिले की आधी अर्थव्यवस्था निर्भर हो गई है। ऑनलाइन शॉपिंग और सेल के दौरान ये बहुत तेजी से बढ़ती है।
गिग वर्कर्स नीरज ने बताया हमारा पूरा काम सामान की डिलेवरी पर मिलने वाला कमीशन है। कोई फिक्स इंकम नहीं है। त्यौहारी व वैवाहिक सीजन के दिनों में किसी दिन तो ये एक हजार से दो हजार रुपए तक कमा लेते हैं, वहीं सामान्य दिनों में दिन के 200 से 300 रुपए से ही काम चलाना पड़ता है। कई बार कंपनी कमीशन भी समय पर रिलीज नहीं करती है, जिससे आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
गिग वर्कर्स पूरी तरह से फ्रीलांस वर्कर्स हैं। सामाजिक सुरक्षा यानि बीमा, दुर्घटना व स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर न तो कंपनियां आगे आ रही हैं और न ही सरकार ने इस ओर ध्यान दिया है। अंतत: एक गिग वर्कर पूरा जोखिम खुद पर लेकर काम करता है।
घरों में खाना, ऑनलाइन शॉपिंग के प्रोडक्ट आदि की डिलेवरी करने वालों की सुरक्षा भगवान भरोसे चल रही है। कई बार ये घटना, दुर्घटना के साथ मारपीट व अभद्रता का शिकार भी हो जाते हैं, लेकिन इनकी सुनने या न्याय दिलाने के लिए कोई संगठन नहीं है। जिससे इनकी आवाज दब जाती है। महिला गिग वर्कर्स के साथ सबसे ज्यादा परेशानी है, कई बार वे नौकरी जाने का खतरे और सामाजिक व्यवहार के चलते अपने साथ होने वाली छेडख़ानी व अभद्रता का विरोध नहीं कर पाती हैं।
जबलपुर डिलेवरी बॉयज महासंघ संरक्षक सौरभ शर्मा ने बताया देश में मजदूरों के लिए दो तरह के कानून हैं, जिन्हें एक संगठित और एक असंगठित विभाजित किया गया है। लेकिन डिलेवरी बॉयज या गिग वर्कर्स के लिए संविधान में कोई परिभाषा ही नहीं है। इन पर श्रम कानून लागू नहीं होता है। दैनिक न्यूनतम वेतन से लेकर प्रॉविडेंट फंड और स्वास्थ्य व जीवन बीमा का लाभ कहीं से नहीं मिल रहा है। जबकि समय की मांग के अनुसार इस तीसरे मजदूर वर्ग का निर्माण हुआ है। शहर में जहां लगभग 20 हजार हैं, वहीं पूरे देश में इनकी संख्या लगभग 1.5 करोड़ है। ऐसे में पहली जवाबदारी सरकारों की है, इसके बाद कंपनियां भी जिम्मेदार हैं।