नदी के किनारों की छानबीन में मिल जाता है सोना-चांदी, खरीदते हैं सुनारों का पट्टा
जबलपुर। देश के हर क्षेत्र का विकास हो रहा है। आधुनिक कम्प्यूटर का युग आ गया है, ऐसे समय में कुछ ऐसे समुदाय भी हैं, जो पुस्तैनी कार्यों को नहीं छोड़ रहे हैं। तमाम तकलीफों को ओढ़े वे आज भी उम्मीद पर जी रहे हैं। ये नदी के किनारों में कीचड़ धोकर खजाना ढूढ़ रहे हैं तो कहीं सुनारों की दुकान से निकलने वाले कूड़े का सौदा करके अपनी जीविका चला रहे हैं। ऐसे समुदाय पर पेश है पत्रिका की ह्यूमन एंगल की रिपोर्ट...।
नाम राजनंदिनी (बदला हुआ नाम), निवास झोपड़पट्टी। बच्चे तीन। राजनंदिनी किसी महल की राजरानी या राजकुमारी नहीं है बल्कि ये रोजाना किसी नदी का किनारा या सुनारों के समीप से गुजरने वाली नालियों में खजाने को तलाशती है। दिनभर की मेहनत के बाद हाथ आए कीमती धातुओं को बेचकर अपना और अपने परिवार का गुजर बसर कर रही है। राजनंदिनी का कहना था कि ये काम हमारे यहां पुस्तैनी चला आ रहा है। हमारी पूर्वज भी यही काम करते थे।
खरीदते हैं पट्टा
यह भाषा सुनार और कारीगीर अच्छी तरह से समझते हैं। पट्टा याने कि सुनार के बैठने की गद्दी। हफ्ते या महीने में एक बार हर सुनार इन लोगों को यह पट्टा बेच देता है। इस पट्टे की सफाई की जाती है। यह सफाई बहुत बारीकी से होती है। इसमें ब्रश से आसपास की धूल झाड़ी जाती है। इस धूल में मिले सोने-चांदी के कण पट्टा खरीदने वाले के हो जाते हैं। कई बार धूल साफ करने के दौरान इन लोगों को फायदा भी होता है। इस समुदाय का कहना है कि धूल झाडऩे के दौरान सोने-चांदी के टुकड़े या नग मिल जाते हैं। इससे हमें खासा मेहनताना मिल जाता है। सुनारों की दुकान के बाहर नाली के मलबे को छानने में भी नग, धातुओं के टुकड़े मिल जाते हैं। कुछ लोगों को हीरे के टुकडे़ भी मिल चुके हैं।
बिक जाता लोहा-तांबा
कचरे को छानकर खोजबीन में मिलने वाला लोहा और तांबा बाजार में बिक जाता है। नर्मदा घाट के किनारे ज्यादातर एक और पांच रुपए के सिक्के मिलते हैं। इसके अलावा तांबा और लोहे के सिक्के या अन्य वस्तुएं मिलती है।
ये थी हकीकत
नर्मदा के किनारे दो महिलाएं कीचड़ को पानी से धो रह थीं। इसमें निकलने वाले पथरीले मलबे से लोहा, तांबा, सोना, चांदी आदि अलग कर रहे थे। मौके पर सिक्का मिलते ही महिला उसे मुंह में डाल लेती थी और फिर सफाई में लग जाती थी। पानी से मिलने वाले धातुओं के तार आदि घाट के किनारे फेंकती थीं, जिसे उसके दो बच्चे उठाकर एक बर्तन में रख रहे थे।
उड़ीसा वनक्षेत्र का है समुदाय
शहर में जीविकोपार्जन में लगा यह समुदाय उड़ीसा के वन क्षेत्र का है। समुदाय की महिलाओं ने बताया कि वे वर्षों से यहां रह रही हैं। इसके पहले उनके पूर्वज भी यही काम करते थे। वर्ष में एक बार गांव जाना होता है। हमारे गांव के लोग और भी शहरों में यही काम करते हैं।