
Life-saving medicines: अमरीका-ईरान युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती अस्थिरता और कच्चे माल की कीमतों में उछाल का असर अब दवा उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। जीवनरक्षक दवाओं से लेकर एंटीबायोटिक, पेन किलर और सर्जिकल उत्पादों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दवा निर्माता और विक्रेता संगठनों के अनुसार पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल, पैकेजिंग सामग्री और परिवहन लागत बढऩे से दवाओं के उत्पादन की लागत में भारी इजाफा हुआ है। इसका सीधा असर नियमित रूप से दवाएं लेने वाले किडनी, लिवर, हृदय रोग, मधुमेह और अन्य गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों के मासिक खर्च पर पड़ रहा है।
दवा कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि कई एंटीबायोटिक और पेन किलर दवाओं की कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। जेनरिक दवाओं के दाम भी बढ़े हैं, जबकि कुछ सामान्य बुखार की दवाओं की कीमतें पहले की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार दवा निर्माण में उपयोग होने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) की लागत में भी भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे उत्पादन लागत प्रभावित हुई है।
प्लास्टिक, पॉलिमर और रेजिन जैसे पेट्रोलियम आधारित उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर दवा उद्योग पर सीधे तौर पर पड़ा है। दवाओं की पैकेजिंग में उपयोग होने वाले ब्लिस्टर पैक, प्लास्टिक सामग्री, एल्युमिनियम फॉयल, कागज के गत्ते और मोनो कार्टन की कीमतों में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। दवा उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार अधिकांश पैकेजिंग और प्रिंटिंग सामग्री चंडीगढ़, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे शहरों से आती है, जिससे परिवहन लागत बढऩे का असर भी कीमतों पर पड़ा है।
दवा निर्माताओं का कहना है कि पेरासिटामोल और ओमेप्राजोल जैसी आम दवाओं के एपीआई की लागत लगभग दोगुनी हो चुकी है। वहीं एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में उपयोग होने वाले अधिकांश रसायन विदेशों से आयात किए जाते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का असर सीधे उत्पादन लागत पर पड़ रहा है।
कीमतों में बढ़ोतरी का असर आयुर्वेदिक दवाओं पर भी पड़ा है। स्वर्ण भस्म सहित कई भस्म और सिरप की लागत बढ़ी है। आयुर्वेदिक उत्पादों में उपयोग होने वाला कच्चा माल मुख्य रूप से उत्तराखंड और दक्षिण भारत से आता है, जिसके कारण परिवहन और पैकेजिंग लागत में वृद्धि का असर इन उत्पादों पर भी दिखाई दे रहा है।
चीन से आयातित एंटीबायोटिक दवाओं, विशेषकर एजथ्रिोमाइसिन और एमोक्सिसिलिन की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज की गई है। संक्रमण संबंधी बीमारियों में व्यापक रूप से उपयोग होने वाली इन दवाओं की लागत बढऩे से मरीजों का खर्च भी बढ़ा है।
जबलपुर और महाकोशल क्षेत्र में एलोपैथी की तीन तथा आयुर्वेद की 80 से अधिक दवा निर्माण इकाइयां संचालित हैं। उमरिया डुंगरिया और रिछाई औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित ये इकाइयां देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी दवाओं की आपूर्ति करती हैं।
दवा निर्माता कंपनी के संचालक नितिन गांधी के अनुसार एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में उपयोग होने वाले अधिकांश रसायन बाहर से आते हैं। पैकेजिंग सामग्री और एपीआई की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के कारण एंटीबायोटिक और पेन किलर दवाओं की कीमतें 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ी हैं। & सरकार द्वारा जेनरिक दवाओं को बढ़ावा दिए जाने के बावजूद पैकेजिंग सामग्री और परिवहन लागत बढऩे के कारण उनकी कीमतों पर भी असर पड़ा है। - आजाद जैन, अध्यक्ष, केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन