भारतीय मनीषियों ने हजारों साल पहले कर दी थी आज के परिवेश की भविष्यवाणी
जबलपुर। भौतिकता की चकाचौंध और आधुनिकता की आंधी में भारतीय परिवेश के हमारे वे नैतिक मूल्य कहीं खोते जा रहे हैं, जो हमें विरासत में मिले थे। आपको यह जानकार हैरानी भी होगी कि नैतिक मूल्यों के इस प्रकार पतन और आदमी के व्यक्तित्व व चरित्र में परिवर्तन की भविष्यवाणी हमारे मनीषियों ने हजारों साल पहले कर दी थी। ये भविष्यवाणियां आज अक्षरश: सच भी साबित हो रही हैं। मनीषियों ने यह तक बता दिया कि आने वाले समय में लड़कियां स्वच्छंद रूप से लिव-इन-रिलेशनशिप अपनाएंगी। संत आडंबरधारी हो जाएंगे, जिसके पास धन होगा वही सक्षम और गुणवान माना जाएगा। न्याय भी पैसे वालों की कठपुतली बन जाएगा। कर्मचारी और श्रमिक सुविधाभोगी हो जाएंगे। ब्राम्हण केवल नाम के लिए जनेऊ धारण करेंगे, वे इसके नियमों का पालन नहीं करेंगे...। आइए श्रीमद्भागवत महापुराण व अन्य ग्रंथों में लिखीं 10 महत्वपूर्ण भविष्यवाणियों से आपको भी रूबरू कराते हैं। इनका सच आपको यह सोचने के लिए भी मजबूर कर देगा कि हमारे भारतीय मनीषी कितने आत्मज्ञानी और दूर दृष्टा थे। इनके बताए रास्तों को छोडकऱ हम जहां जा रहे हैं, वहां आखिर वहां हमें क्या मिलने वाला है...?
1.
वित्तमेव कलौ नृणां,
जन्माचारगुणोदय।
धर्मन्याय व्यवस्थायां
कारणं बलमेव हि ॥
अर्थात - कलयुग में वही व्यक्ति गुणवान माना जायेगा जिसके पास ज्यादा धन है। न्याय सिर्फ उसी व्यक्ति के लिए केन्द्रित हो जाएगा, जिसके धन बल और बाहुबल रहेगा।
2.
दाम्पत्येऽभिरुचि र्हेतु:
मायैव व्यावहारिके ।
स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रति:
विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥
अर्थात - विवाह एक पवित्र बंधन नहीं होकर अभिरुचि के हिसाब से किया गया आपसी समझौता होकर रह जाएगा। लड़कियां किसी भी युवक व व्यक्ति के साथ स्वच्छंद रूप से कमरे में रहेंगी। स्वेच्छाचारिता से शारीरिक संबंध बनाएंगी। व्यापारी झूठ बोलकर धन कमाने वाले और मायावी हो जाएंगे। ब्राम्हण केवल नाम के लिए जनेऊ धारण करेंगे। वे इसके नियमों का पालन नहीं करेंगे।
3.
लिङ्गं एवाश्रमख्यातौ,
अन्योन्यापत्ति कारणम् ।
अवृया न्यायदौर्बल्यं,
पाण्डित्ये चापलं वच: ॥
अर्थात - न्याय उसी व्यक्ति को मिल पाएगा, जिसके पास अधिकारियों को देने के लिए पैसे व लांच, घूंस आदि होगी। चालाक, मायावी बातें करने वाले व्यक्ति ज्ञानी और पंडित कहलाएंगे। न्याय पाने के लिए महंगा शुल्क यानी फीस चुकानी पड़ेगी। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को न्याय मिल पाना कठिन हो जाएगा।
4.
दूरे वार्ययनं तीर्थं,
लावण्यं केशधारणम् ।
उदरंभरता स्वार्थ:,
सत्यत्वे धाष्ट्र्यमेव हि॥
अर्थात - लोग बड़े-बड़े बाल रखेंगे। वे नदी, जलाशयों और पवित्र तीर्थ स्थानों पर धार्मिक और आध्यात्मिक भावना की जगह सैर-सपाटे के उद्देश्य से वहां जाएंगे। माता-पिता का अनादर करेंगे। लोग अपना पेट भरने के लिए बुरा या पाप कर्म करने में भी संकोच नहीं करेंगे।
5.
अनाढ्यतैव असाधुत्वे,
साधुत्वे दंभ एव तु।
स्वीकार एव चोद्वाहे
स्नानमेव प्रसाधनम्॥
अर्थात - कलयुग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा उसे असाधु यानी अपवित्र, अधर्मी और दरिद्र माना जाएगा। बुद्धि और ज्ञान का कोई मोल नहीं होगा। विवाह के नाम पर स्त्री-पुरुष के बीच केवल समझौता होगा, आपसी समर्पण का भाव घट जाएगा। लोग स्नान को ही शरीर का शुद्धिकरण समझने लगेंगे।
6.
दाक्ष्यं कुटुंबभरणं
यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ।
एवं प्रजाभिर्दुष्टाभि:
आकीर्णे क्षितिमण्डले ॥
अर्थात - कलयुग में लोग सिर्फ दूसरो के सामने अच्छा दिखने के लिए यानी दिखावे के लिए धर्म-कर्म के काम करेंगे। पृथ्वी पर भ्रष्ट लोगों की संख्या बढ़ जाएगी। लोग सत्ता या शक्ति हासिल करने के लिए किसी को मारने या षडय़ंत्रपूर्वक कष्ट पहुंचाने में पीछे नहीं रहेंगे। मनचाही सुविधाएं पाकर श्रमिक वर्ग आलसी यानी अलाल हो जाएगा।
7.
ततश्चानुदिनं धर्म:,
सत्यं, शौचं, क्षमा, दया।
कालेन बलिना राजन्।
नङ्क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृति॥
अर्थात - कलयुग में धर्म, स्वच्छता, सत्यवादिता, शारीरक शक्ति, दया भाव और जीवन की अवधि दिन-ब-दिन घटती जाएगी। लोग स्वेच्छाचारी, विधर्मी और धूर्त हो जाएंगे। काल के प्रभाव से स्मरण शक्ति दुर्बल हो जाएगी।
8.
क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव,
संतप्स्यन्ते च चिन्तया।
त्रिंशद्विंशति वर्षाणि,
परमायु: कलौ नृणाम।।
अर्थात - अपने ही किए कर्मों के आधार पर कलयुग में लोग कई तरह की चिंताओं में घिरे रहेंगे। बचपन से ही भटकाव शुरू हो जाएगा। युवावस्था आते-आते तक व्यक्ति इतना तंग हो जाएगा कि उसकी आयु क्षीण हो जाएगी। एक समय ऐसा भी आएगा जब मनुष्य की उम्र घटकर सिर्फ 20-30 साल की रह जाएगी।
9.
अनावृष्ट्या विनङ्क्ष्यन्ति
दुर्भिक्षकरपीडिता:।
शीतवातातपप्रावृड्यं
हिमैरन्योन्यत: प्रजा:॥
अर्थात - कलयुग में अपने स्वार्थ के लिए लोग प्रकृति और पर्यावरण को क्षति पहुंचाएंगे। फल स्वरूप समय पर बारिश होना बंद हो जाएगी। हर जगह सूखे की स्थिति बनेगी। मौसम विचित्र हो जाएगा। कभी तो भीषण गर्मी पड़ेगी तो कभी इतनी अधिक सर्दी पड़ेगी कि मानव जीवन असहनीय हो जाएगा। कुसमय पर बाढ़, आंधी और हिमस्खलन से प्रजा परेशान हो जाएगी।
10.
आच्छिन्नदारद्रविणा,
यास्यन्ति गिरिकाननम।
शाकमूलामिषक्षौद्र:
फल पुष्पाष्टिभोजना:॥
अर्थात - सरकारों की वित्तीय व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। किसी वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाकर राजनीतिक फायदे के लिए सरकारें कामकाजी लोगों पर इतना अधिक कर थोप देंगी कि लोग त्रस्त हो जाएंगे। एक समय ऐसा भी आएगा कि लोग नगरों और शहरों को छोडकऱ जंगलों की तरफ पलायन करने के लिए विवश हो जाएंगे। सूखा और बाढ़ के कारण अन्न नहीं उपजेगा तो लोग पेड़ों के पत्ते, मांस, फूल, जंगली शहद आदि खाकर पेट भरने के लिए मजबूर हो जाएंगे।
- प्रेमशंकर तिवारी