
जबलपुर। पुलिस की लापरवाही के चलते एक नाबालिग की आधी जवानी जेल की काल कोठरी में बीत गई। अधूरी-जांच पड़ताल के चलते उसे महज पंद्रह साल की उम्र में आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई थी। करीब 12 साल बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर युवक शुक्रवार को जेल से बाहर आया। युवक जब छिंदवाड़ा जेल से रिहा हुआ तो उसके चेहरे से अपने साथ हुए अन्याय का दर्द साफ झलक रहा था। जब वह जेल गया तो उसका बचपन भी नहीं बीता था और जब जेल से बाहर आया तो आधी जवानी खत्म हो चुकी थी। यह बात हाईकोर्ट के संज्ञान में नहीं लाई गई होती, तो शायद उसे सारी उम्र ही जेल में बिताना पड़ जाता। हाईकोर्ट के निर्देश पर जुवेनाइल बोर्ड ने युवक को रिहा करने के निर्देश दिए।
लाश के पास हो गया था बेहोश
अभियोजन के अनुसार छिंदवाड़ा जिले के उमरेठ थानांतर्गत सिंदरई रैयत ग्राम निवासी पंद्रह वर्षीय किशोर भूरा मवासी ने 11 जनवरी 2006 को शराब के नशे में रिश्ते में काका गुल्लू को जमीन के विवाद में चूल्हे की लकड़ी से मार डाला। इसके बाद भूरा वहीं बेहोश हो गया। भूरा को 8 सितंबर 2006 को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई।
उम्र की नहीं की जांच-होने पर
इसके खिलाफ नवंबर 2006 में दायर अपील पर 7 सितंबर 2017 को हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति ने अधिवक्ता स्नेह मिश्रा को आरोपी की पैरवी का जिम्मा सौंपा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि दरअसल अपीलकर्ता घटना के समय नाबालिग था। उसका मामला किशोर न्यायालय के समक्ष सुना जाना था। लेकिन पुलिस ने इसकी जांच नहीं की।
छिंदव़ाड़ा जेल से छूटा
हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित कमेटी ने 29 जनवरी 2018 को रिपोर्ट पेश कर बताया गया कि आरोपी के स्कूली व अन्य दस्तावेजों के आधार पर घटना के समय उसकी आयु 15 वर्ष 6 माह ही थी। इस पर कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि अपीलकर्ता जुवेनाइल बोर्ड के समक्ष आवेदन पेश करे, ताकि उसे रिहा किया जा सके। छिंदवाड़ा जुवेनाइल बोर्ड के समक्ष अपील करने पर बोर्ड ने 23 मार्च को उसका रिहाई वारंट जारी कर दिया।