जबलपुर

जबलपुर में कीचड़ भरे रास्ते पर महिला की डिलीवरी, मजबूर होकर ग्रामीण खुद बना रहे 2 किमी सड़क

Woman Delivery On Muddy Path : 1200 आबादी वाले दुर्गानगर गांव में आजादी से लेकर अबतक सड़क ही नहीं बन सकी है। महिला की कीचड़ भरे रास्ते में डिलीवरी होने के बाद ग्रामीण सिस्टम से मायूस होकर खुद ही इस रास्ते को बनाने में जुट गए हैं।
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Woman Delivery On Muddy Path
सिस्टम से मायूस ग्रामीण खुद बना रहे 2 कि.मी मार्ग (फोटो सोर्स: PTI)

Jabapur News : भले ही सरकार मध्य प्रदेश में विकास के तमाम दावे कर रही हो, लेकिन आए दिन सामने आने वाली अलग अलग घटनाएं इन दावों की पोल खोल देते हैं। ऐसा ही एक मामला सूबे की संस्कारधान जबलपुर के जिले में सामने आया है। शहर से महज 40 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत चेरापौढ़ी के दुर्गानगर गांव की हकीकत सरकार के इन्हीं विकास के दावों की पोल खोल देती है। गांव को मुख्य सड़क मार्गों से जोड़ने के दावे की पोल खोलते 1200 आबादी वाले इस गांव में आजादी से लेकर अबतक सड़क ही नहीं बन सकी है, जिसका खामियाजा यहां ग्रामीणों को आए दिन भुगतना पड़ता है। सिस्टम से लंबी उम्मीद और जिम्मेदारों के दर पर सड़क की गुहार लगाने के बाद आजादी से अबतक एक सड़क से वंचित इस गांव के लोगों ने खुद ही इस मार्ग के निर्माण का बीड़ा उठा लिया है।

गांव के लोगों ने खुद अपने ही हाथों में फावड़ा और तसला थाम लिया है। बुनियादी सुविधाओं से वंचित इन ग्रामीणों ने सरकार के भरोसे बैठने के बजाय खुद ही 2 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने का बीड़ा अपने कांधों पर उठाया है। कीचड़ और पानी से भरी इस राह पर चलने को मजबूर इन ग्रामीणों की यह तस्वीर व्यवस्था के माथे पर एक करारा तमाचा है। ग्रामीणों का कहना है कि, वैसे तो इस दो किलोमीटर के पगडंडी मार्ग पर अबतक पांच बच्चों का कीचड़ में जन्म हो चुका है। लेकिन अब इस दुख में गांव में रहने वाली रामकली का दुख भी जुड़ गया है। क्योंकि, परिजन द्वारा अस्पताल ले जाते समय रामकली द्वारा भी इसी कीचड़ में बच्चे को जन्म दिया है।

बरगी बांध के लिस्थापित आदिवासियों का 35 साल पुराना दर्द

सिस्टम से मायूस ग्रामीण खुद बना रहे 2 कि.मी मार्ग (फोटो सोर्स: PTI)

बता दें कि, 35 साल पहले जबलपुर के बरगी बांध के लिए अपने घर-बार कुर्बान करने वाले आदिवासियों को लगा था कि, विस्थापन के बाद दुर्गानगर में उनका जीवन संवर जाएगा, लेकिन गांव में रहने वाली रामकली को शाय पता नहीं था कि, जिस गांव को कागजों पर आज भी पूर्ण गांव का दर्जा नहीं मिला, वहां बुनियादी सुविधाएं भी एक सपना बनकर रह जाएंगी। जब रामकली गर्भवती हुई तो उसने अपने आने वाले बच्चे के लिए न जाने कितने सपने बुन लिए थे। रामकली के अनुसार, वो चाहती थी कि, उसका बच्चा एक सुरक्षित माहौल में जन्म ले, लेकिन जैसे ही प्रसव की तारीख पास आई, गांव की कड़वी हकीकत सामने आ खड़ी हुई।

बारिश में दल दल बन जाता है 2 कि.मी का रास्ता

सिस्टम से मायूस ग्रामीण खुद बना रहे 2 कि.मी मार्ग (फोटो सोर्स: PTI)

बारिश के पानी से गांव का 2 से ढाई किलोमीटर का रास्ता दलदल बन चुका था। ऐसे में न तो यहां एंबुलेंस आ सकती थी और ना ही कोई गाड़ी। जब रामकली को तेज प्रसव पीड़ा हुई तो परिजन के सामने कीचड़ भरे रास्ते पर पैदल ले जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। यहा दुर्गम रास्ते से गुजरते वक्त बच रास्ते में खुले आसमान के नीचे रामकली का प्रसव हो गया। बिना किसी डॉक्टर, बिना किसी मेडिकल सुविधा के, दर्द से कराहती रामकली ने अपने कलेजे के टुकड़े को जन्म दिया। उस वक्त मां और बच्चे दोनों की सांसें अटकी हुई थीं। गनीमत रही कि दोनों सुरक्षित हैं, लेकिन इस दर्दनाक अनुभव ने रामकली के मन पर ऐसा जख्म छोड़ा जिसने गांव की चेतना को झकझोर दिया।

पूरा गांव सड़क बनाने में जुटा

सिस्टम से मायूस ग्रामीण खुद बना रहे 2 कि.मी मार्ग (फोटो सोर्स: PTI)

रामकली की इस मजबूरी और आंखों के आंसुओं ने दुर्गानगर के ग्रामीणों को जगा दिया। ग्रामीणों की मानें तो उन्हें समझ आ गया है कि, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से मामले का हल नहीं होगा, बल्कि रामकली के दर्द को अपनी ताकत बनाकर पूरा गांव हाथों में फावड़ा और तसला लेकर 2 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने में जुट गया है। रामकली आज अपने स्वस्थ बच्चे को गोद में लिए गांव वालों का पसीना बहते देखती है, तो उसकी आंखों में फिर एक नया सपना तैरने लगता है। एक ऐसा रास्ता, जिस पर आने वाली किसी और रामकली को मां बनने के लिए कीचड़ में न तड़पना पड़े।

Updated on:
12 Sept 2026 05:39 pm
Published on:
12 Sept 2026 05:38 pm