
Chhattisgarh Education System: आदिवासी अंचल के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी चिंता बढ़ाने वाली है। छत्तीसगढ़ के जगदलपुर जिले में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था शिक्षकों की कमी से जूझ रही है। युक्तियुक्तकरण के बाद भी जिले के 307 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां पूरी व्यवस्था सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रही है। एक समय जिले में एकल शिक्षकीय स्कूलों की संख्या 292 थी, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर 307 तक पहुंच गया है। इससे साफ है कि शिक्षकों की कमी का संकट अभी भी दूर नहीं हो पाया है।
एकल शिक्षकीय स्कूलों में पदस्थ शिक्षक सिर्फ बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें कई अन्य जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ रही हैं। कक्षा संचालन के साथ मिड-डे मील की निगरानी, सरकारी योजनाओं की जानकारी, रिकॉर्ड तैयार करना, विभागीय रिपोर्ट भेजना और प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे बच्चों को पर्याप्त समय देकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे उपलब्ध कराएं।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी के पीछे कई कारण हैं। कुछ प्रधान अध्यापकों की मृत्यु हो गई, वहीं कुछ शिक्षकों का चयन दूसरी नौकरियों में हो गया या उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इन पदों पर नई नियुक्तियां नहीं होने के कारण कई स्कूलों में शिक्षक संख्या लगातार कम होती गई और एकल शिक्षकीय विद्यालयों की संख्या बढ़ती चली गई।
शिक्षकों के संतुलित वितरण के उद्देश्य से युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया शुरू की गई थी। उम्मीद थी कि इससे ऐसे स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर होगी, जहां जरूरत ज्यादा है। लेकिन वर्तमान स्थिति बताती है कि कई प्राथमिक स्कूल अब भी पर्याप्त शिक्षकों का इंतजार कर रहे हैं। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिल रहा है।
एक शिक्षक के भरोसे चल रहे स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की चिंता बढ़ गई है। एक ही शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाना पड़ता है, जिससे हर बच्चे को पर्याप्त ध्यान मिल पाना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती शिक्षा बच्चों के भविष्य की नींव होती है, ऐसे में प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता बेहद जरूरी है।
शिक्षा विभाग का कहना है कि जब तक नई शिक्षक भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं होती और शिक्षकों की पदस्थापना नहीं होती, तब तक एकल शिक्षकीय स्कूलों की संख्या में कमी लाना चुनौतीपूर्ण रहेगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आदिवासी अंचल के बच्चों का भविष्य लंबे समय तक एक ही शिक्षक के भरोसे रहेगा, या सरकार जल्द भर्ती कर इन स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराएगी।