जगदलपुर

देश के दशहरे से कैसे अलग है बस्तर का पर्व? 75 दिनों तक निभाई जाती हैं अनूठी परंपराएं, जानिए 600 साल पुराना इतिहास

Bastar Dussehra History: देशभर में दशहरे पर रावण दहन के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, लेकिन बस्तर में यह पर्व मां दंतेश्वरी की आराधना और आदिवासी परंपराओं को समर्पित है।
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Oct 16, 2026
Bastar Dussehra Traditions
बस्तर में निकलता है विशाल रथ (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Bastar Dussehra: देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। शाम होते ही मैदानों में रावण के विशाल पुतले खड़े किए जाते हैं और आतिशबाजी के बीच उनका दहन होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरे की तस्वीर बिल्कुल अलग है।

यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही पर्व का मुख्य केंद्र राम-रावण युद्ध होता है। यहां दशहरा मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपरा, आदिवासी संस्कृति और विशाल रथ परिक्रमा का पर्व है। यही वजह है कि दशहरे की ये दोनों परंपराएं एक ही सनातन सांस्कृतिक परंपरा में विविधता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

छह सौ साल पुरानी परंपरा, राजा पुरुषोत्तम देव से जुड़ा इतिहास

बस्तर दशहरे का इतिहास लगभग छह सौ साल पुराना माना जाता है। इसकी परंपरा बस्तर के काकतीय राजवंश के राजा पुरुषोत्तम देव से जोड़ी जाती है। प्रचलित ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, जगन्नाथ पुरी की यात्रा और वहां भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी भक्ति से जुड़ी परंपराओं के बाद बस्तर में रथोत्सव की परंपरा को विशेष महत्व मिला। राजा को ‘रथपति’ की उपाधि मिलने का उल्लेख भी इस परंपरा के ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है।

75 दिनों तक चलने वाला सबसे बड़ा पर्व

बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां के जनजीवन, आस्था, परंपराओं और सामुदायिक एकता का जीवंत उत्सव है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान सामने आती है। देश के दूसरे हिस्सों में जहां दशहरा एक दिन के रावण दहन के साथ अपने चरम पर पहुंचता है, वहीं बस्तर में यह पर्व कई धार्मिक अनुष्ठानों, देवी-देवताओं के आगमन और पारंपरिक रथ यात्रा के जरिए आगे बढ़ता है।

राम-रावण की कथा से अलग बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका मुख्य धार्मिक आधार रामायण में वर्णित रावण वध की परंपरा नहीं है। यहां मां दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा पर्व के केंद्र में रहती है। इसलिए बस्तर में दशहरे के अवसर पर रावण दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती। इसके बजाय पूजा-पाठ, पारंपरिक अनुष्ठान, देवी-देवताओं के प्रतीकों और पालकियों का आगमन तथा रथ परिक्रमा जैसे आयोजन होते हैं। देश में दशहरा जहां श्रीराम की विजय का संदेश देता है, वहीं बस्तर में यह आदिशक्ति के प्रति श्रद्धा और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का अवसर बनता है।

हरेली अमावस्या से शुरू होती है आस्था की यात्रा

इतिहासकार अप्रतिम झा के अनुसार, बस्तर दशहरे की शुरुआत हरेली अमावस्या पर होने वाली पाट जात्रा से होती है। इस अनुष्ठान में जंगल से लाए गए साल वृक्ष की लकड़ी के लट्ठे की पूजा की जाती है। इसके बाद पर्व से जुड़े विभिन्न धार्मिक और पारंपरिक आयोजन आगे बढ़ते हैं। काछनगादी, जोगी बिठाई, मावली परघाव, रथ परिक्रमा और मुरिया दरबार जैसे आयोजन इस लंबे पर्व के प्रमुख पड़ाव हैं। इन अनुष्ठानों में प्रकृति, स्थानीय देवी-देवताओं, आदिवासी मान्यताओं और सामुदायिक सहभागिता का गहरा संबंध दिखाई देता है।

रथ परिक्रमा में उमड़ती है आस्था

बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विशेष स्थान है। पर्व के दौरान विशाल पारंपरिक रथ को खींचने में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय लोग सहभागी बनते हैं। रथ परिक्रमा केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक भी है। विभिन्न गांवों से देवी-देवताओं के प्रतीकों और पारंपरिक प्रतिनिधियों का जुड़ना इस आयोजन को पूरे बस्तर की आस्था से जोड़ता है। यहां जंगल, परंपरा, देवी आराधना और सामुदायिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं। इसमें निभाई जाने वाली पारंपरिक भूमिकाएं इसे केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक विरासत बनाती हैं।

Updated on:
16 Oct 2026 04:31 pm
Published on:
16 Oct 2026 04:31 pm