
मंदिर चौक (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Nav Durga Shakti Peeth: बिलासपुर जिले का जरहाभाटा चौक आज पूरे क्षेत्र में मंदिर चौक के नाम से जाना जाता है। यहां स्थित नव दुर्गा शक्ति पीठ मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि इसका इतिहास भी बेहद खास है। यह मंदिर उस दौर की याद दिलाता है, जब देश आजाद हुआ था और यहां आस्था का बीजारोपण हुआ था। नवरात्र के दिनों में इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। माता के दरबार में श्रद्धालु मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित कर अपनी मन्नत मांगते हैं। इस बार चैत्र नवरात्र में 1065 ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए हैं।
पीपल के पेड़ के बढ़ने के साथ ही यहां लोगों की आस्था भी पनपने लगी। वर्ष 1963 में भक्तों ने यहां हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की। तभी से इस मार्ग से गुजरने वाले राहगीर रुककर हनुमान जी की पूजा-अर्चना करने लगे। धीरे-धीरे यह स्थान भक्तों के लिए पूजनीय बन गया।
वर्ष 1996 में ट्रस्ट के सदस्यों ने जम्मू-कश्मीर स्थित वैष्णो देवी मंदिर से पवित्र ज्योत लाकर यहां स्थापित की। तभी से मंदिर में अखंड ज्योत प्रज्वलित है। भक्तों का विश्वास है कि मां दुर्गा के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत अवश्य पूरी होती है। यही कारण है कि यहां वर्षों से श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा हुआ है और आज भी लोगों की आस्था कायम है।
नवरात्र के दिनों में इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है। माता के दरबार को आकर्षक रोशनी और फूलों से सजाया जाता है। आसपास का पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल से सराबोर हो जाता है। नवरात्र शुरू होने से पहले ही श्रद्धालु मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित करवाने के लिए मंदिर पहुंचने लगते हैं।
मां दुर्गा के दरबार में पहुंचकर श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति का अनुभव होता है। यहां हर वर्ग और हर उम्र के लोग दर्शन के लिए आते हैं। कोई अपने परिवार में सुख-समृद्धि की कामना करता है, तो कोई संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगता है। भक्तों की मान्यता है कि मां दुर्गा अपने दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
आज इस मंदिर की ख्याति इतनी है कि पूरा क्षेत्र ही मंदिर चौक के नाम से जाना जाता है। सुबह से देर रात तक यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। नवरात्र के अलावा भी सालभर लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर मां दुर्गा के दरबार में आते हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि यहां बैठकर उन्हें आत्मिक शांति और सुकून मिलता है।
नव दुर्गा शक्ति पीठ ट्रस्ट के अध्यक्ष ओंकार शाजवानी बताते हैं कि वर्ष 1947 में भारत की आजादी के जश्न और उसकी स्मृति में यहां पीपल का एक पेड़ लगाया गया था। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह साधारण-सा पेड़ एक दिन आस्था का प्रतीक बन जाएगा।
हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित होने के बाद लोगों की श्रद्धा और बढ़ी। वर्ष 1966 में भक्तों ने इसी पीपल के नीचे भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की। इसके बाद लोग यहां पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन करने लगे। धीरे-धीरे इस स्थान की धार्मिक पहचान मजबूत होती चली गई।
मंदिर का वर्तमान स्वरूप 9 अप्रैल 1984 को रामनवमी के दिन सामने आया। गाजे-बाजे और भक्तों की भीड़ के बीच यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई। इस दिन को मंदिर के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। मां दुर्गा की स्थापना के बाद मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ने लगी और दूर-दराज से भी लोग दर्शन के लिए आने लगे।
शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्र के छठवें दिन मां दुर्गा के छठवें स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। देवी का यह स्वरूप शक्ति, साहस, पराक्रम और अधर्म के विनाश का प्रतीक माना जाता है। सरकंडा के सुभाष चौक स्थित श्री पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर में नवरात्र महोत्सव वैदिक परंपराओं के अनुसार मनाया जा रहा है। यहां 125 मनोकामना घृत ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए हैं।
मंदिर में प्रतिदिन विभिन्न देवी-देवताओं का पूजन, अभिषेक और शृंगार किया जा रहा है। पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश ने बताया कि नवरात्र के छठवें दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस अवसर पर मंदिर में मां श्री ब्रह्मशक्ति बगलामुखी देवी का विशेष पूजन भी किया जाएगा।
Updated on:
16 Oct 2026 02:13 pm
Published on:
16 Oct 2026 02:13 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
