CG News: बस्तर में गन्ने का उपयोग मुख्य रूप से गुड़ बनाने के लिए किया जाता है। आज भी हर साल लगभग 150 व्यापारी और किसान मिलकर करीब 20 लाख रुपए का गुड़ तैयार करते हैं।
CG News: बस्तर में परंपरागत खेती से जुड़े किसानों की गन्ने की खेती में कम रुचि के कारण राज्य सरकार की शक्कर कारखाना स्थापित करने की योजना अधर में लटक गई है। इस परियोजना को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए कम से कम 8 से 10 हेक्टेयर खेती की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जिले में केवल 328 हेक्टेयर में ही गन्ना उत्पादन हो रहा है।
बस्तर जिले में गन्ना की खेती लगातार सिमटती जा रही है। एक समय था जब जिले में गन्ने का उत्पादन 5 से 6 हजार हेक्टेयर में बड़े पैमाने पर किया जाता था, लेकिन अब किसान अन्य फसलों, विशेष रूप से धान और मक्का की खेती की ओर अधिक झुकाव दिखा रहे हैं। इसके चलते गन्ने से गुड़ बनाने का पारंपरिक व्यवसाय भी धीरे-धीरे कम हो रहा है। गन्ने की खेती में लगातार गिरावट आने से यह क्षेत्र पिछड़ रहा है।
किसानों की अरुचि का कारण: किसान धान और सब्जी जैसी परंपरागत फसलों को छोड़कर गन्ने की खेती करने के लिए तैयार नहीं हैं।
सिंचाई की समस्या: पर्याप्त सिंचाई सुविधा न होने के कारण गन्ने की खेती को बढ़ावा देना मुश्किल हो रहा है।
गन्ने की दरें तय न होना: किसानों को यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें गन्ने की खेती से उचित लाभ मिलेगा या नहीं।
भौगोलिक बाध्यता: गन्ने की आपूर्ति केवल 40 किलोमीटर की परिधि के भीतर से संभव होनी चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़ाने में और कठिनाई आ रही है।
बकावंड ब्लॉक में शक्कर कारखाने की स्थापना का प्रस्ताव विधायक लखेश्वर बघेल की पहल पर सात वर्ष पहले कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के सामने रखा गया था। हालांकि अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार, बस्तर में गन्ने की आपूर्ति निरंतर और पर्याप्त मात्रा में संभव नहीं है, जिससे यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई।
CG News: बस्तर में गन्ने का उपयोग मुख्य रूप से गुड़ बनाने के लिए किया जाता है। आज भी हर साल लगभग 150 व्यापारी और किसान मिलकर करीब 20 लाख रुपए का गुड़ तैयार करते हैं। बस्तर और बकावंड ब्लॉक के किसान इस उत्पादन में सबसे आगे हैं। पहले आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओड़िसा से व्यापारी बस्तर में गुड़ खरीदने आते थे, लेकिन अब इसकी आवक घट गई है।
गन्ना उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। जिस तरह अन्य फसलों पर अनुसंधान कर नई उन्नत किस्में विकसित की जा रही हैं, उसी तरह गन्ने पर भी अनुसंधान की आवश्यकता है। बस्तर के कुहरावंड स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र में गन्ने की नई और अधिक उत्पादन देने वाली वैरायटी पर शोध किया जाना चाहिए, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई पहल नहीं हुई है। बस्तर जिले में गन्ना उत्पादन के लिए किसान एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। यदि स्थानीय स्तर पर अच्छी वैरायटी विकसित की जाए, तो किसान फिर से इस फसल की ओर आकर्षित हो सकते हैं। गन्ने की खेती को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी योजनाओं और तकनीकी सहायता की भी आवश्यकता है।
राजीव श्रीवास्ताव, उप संचालक कृषि: गन्ना खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन बस्तर के किसानों का अधिक रुझान मक्का और धान की फसल की पर है। गन्ना की फसल क्लाइमेट, सिचांई व्यवस्था और मिट्टी पर निर्भर हैं। वहीं एक बड़े पेच में इसकी खेती होती है। ऐसे में बड़े किसान ही गन्ना की खेती करते हैं। हालांकि किसानों को गन्ना की फसल के लिए विभाग के द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है।