जयपुर

पूजा क्रियाकांड नहीं, कर्म निर्जरा और कल्याण का कल्पवृक्ष : मुनि सुप्रभ सागर

Aug 02, 2026
Rajasthan

देवली. मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि पूजा मात्र क्रियाकांड नहीं, बल्कि कर्म निर्जरा और कल्याण का कल्पवृक्ष है। पूजा के माध्यम से हम अपने इष्ट से जुड़कर अविनाशी सुख प्राप्त कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि षट्आवश्यक में देवपूजा का स्थान प्रमुख है। पूजा में गुरु उपासना, स्वाध्याय, तप, त्याग, दान एवं संयम ये पांचों आवश्यक गर्भित हो जाते हैं। इसलिए सच्चा श्रावक वही है, जो छहों आवश्यक का पालन करे।

मुनि ने कहा कि जैसे कल्पवृक्ष से मांगे बिना सब कुछ मिल जाता है, वैसे ही जिनेंद्र भगवान की पूजा से जीवन में सुख-शांति आती है। देव भी अपने विमान स्थित चैत्यालयों में प्रतिदिन अभिषेक करते हैं और महोत्सव पर नंदीश्वर द्वीप जाकर अकृत्रिम जिनबिंबों की पूजा करते हैं। जब देव भी प्रतिदिन पूजा करते हैं तो मनुष्यों के लिए इसका महत्व समझा जा सकता है।
पूजा की परिभाषा बताते हुए मुनि ने कहा कि पूजा का वास्तविक अर्थ गुणानुवाद है। भगवान में जो गुण हैं, वे गुण मुझमें भी आएं, यही सच्ची पूजा है। द्रव्य सामग्री केवल अवलंबन है।


देवली. महावीर मंदिर में प्रवचन करते मुनि सुप्रभ सागर महाराज।

Updated on:
02 Aug 2026 06:01 am
Published on:
02 Aug 2026 06:01 am