पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 'इंतज़ारशास्त्र' सीरीज का 'चैप्टर 8' जारी करते हुए भजनलाल सरकार पर तीखा हमला बोला है। इस बार दिव्यांगों (विशेष योग्यजनों) के अधिकारों और उनके भविष्य को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया है।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन दिनों अपनी डिजिटल सीरीज 'इंतज़ारशास्त्र' के जरिए प्रदेश की भाजपा सरकार की घेराबंदी कर रहे हैं। आज सोमवार को इसका आठवां हिस्सा जारी किया गया, जिसमें गहलोत ने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार 'राजनीतिक प्रतिशोध' की आग में प्रदेश के दिव्यांगों का भविष्य स्वाहा कर रही है।
गहलोत ने सीधे शब्दों में पूछा कि क्या भाजपा को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और समाज सुधारक बाबा आम्टे के नाम से इतनी नफरत है कि उनके नाम पर बने संस्थानों को बंद या सीमित किया जा रहा है?
अशोक गहलोत ने अपने वीडियो संदेश और सोशल मीडिया पोस्ट में दो प्रमुख शिक्षण संस्थानों की बदहाली का जिक्र किया है:
जयपुर का बाबा आम्टे दिव्यांग विश्वविद्यालय: गहलोत का दावा है कि पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा बड़े स्तर पर शुरू किया गया यह विश्वविद्यालय अब महज 2 कमरों में सिमट कर रह गया है।
जोधपुर का महात्मा गांधी दिव्यांग विश्वविद्यालय: गहलोत ने आरोप लगाया कि जोधपुर में बन रहे इस विश्वविद्यालय का काम पूरी तरह से ठप पड़ा है। उन्होंने इसे विशेष योग्यजनों के साथ अन्याय बताया।
गहलोत ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि संस्थानों का काम इसलिए रोका गया है क्योंकि वे गांधी और बाबा आम्टे के नाम पर हैं।
उन्होंने ट्विटर (X) पर लिखा, "क्या गांधी और बाबा आम्टे के नाम से इतनी चिढ़ है कि दिव्यांगों का भविष्य दांव पर लगा दिया? राजनीतिक प्रतिशोध की ये कैसी आग, जिसमें प्रदेश का विशेष योग्यजन झुलस रहा है? सरकार जवाब दे!"
अशोक गहलोत की यह सीरीज राजस्थान की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है। लगभग हर दिन वे एक नया 'चैप्टर' लेकर आते हैं, जिसमें वे उन योजनाओं का जिक्र करते हैं जो कांग्रेस राज में शुरू हुई थीं लेकिन अब 'इंतज़ार' की भेंट चढ़ गई हैं।
दिलचस्प बात यह है कि आज 30 मार्च को पूरा प्रदेश राजस्थान दिवस मना रहा है, वहीं गहलोत ने इस दिन को 'अधिकारों की लड़ाई' के रूप में पेश किया है। उन्होंने भाजपा सरकार से पूछा है कि 'विकसित राजस्थान 2047' का सपना दिव्यांगों को पीछे छोड़कर कैसे पूरा होगा?
गहलोत के इस हमले के बाद अब गेंद भजनलाल सरकार के पाले में है। जयपुर और जोधपुर के विश्वविद्यालयों के छात्र और परिजन भी अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या वाकई बजट या नाम के कारण उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है?