बाड़मेर में रिफाइनरी का कार्य शुभारंभ हो गया। अब लगता है कि आती-जाती सरकारों के बीच के प्रोजेक्ट्स में अब कार्य शुभारंभ के रूप में एक नई परिपाटी शुरु
विशाल सूर्यकांत। बाड़मेर में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी रिफाइनरी को लेकर अपने-अपने दावे करती रहे, लेकिन सच्चाई ये हैं कि बाड़मेर की रिफाइरी अब तक 'बयानों की रिफाइनरी' से ज्यादा कुछ नहीं बन पाई है। आते-जाते राजनीतिक नेतृत्व की बात छोड़िए, सरकार के फैसले और उसकी मंशा क्या ये हश्र होना चाहिए। आज बीजेपी है, कल कांग्रेस थी...परसो न जाने कौन सा दल सत्ता में आए। प्रोजेक्ट्स में राजनीतिक लाभ-हानि के साथ क्या विकास का सही रोडमैप बनता है....योजना की जमीन और शिलान्यास के मुद्दे पर राजनीति होगी तो फिर कौनसा प्रोजेक्ट सही वक्त पर फलीभूत होगा?
आज प्रधानमंत्री मोदी ने बाड़मेर में कांग्रेस को कोसने में कसर नहीं छोड़ी, पेट्रोलियम मंत्री भी खूब बोले कि बिना किसी तैयारी के पूर्व सरकार ने प्रोजेक्ट का शिलान्यास करवा दिया। अगर ये सही है तो सरकार को वाकई अधिकारिक रूप से तथ्य सामने रखने चाहिए। अगर ये नहीं किया तो माना जाएगा कि बयानबाजी में राजनीति के अलावा कुछ नहीं। बहरहाल, रिफाइनरी और राजनीति का किस्सा पुराना है, लेकिन क्या आज विकास का कोई रोड़मैप नजर आया? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजस्थान दौरे पर थे.. क्या राजस्थान के लिए कोई अहम घोषणा की जरूरत नहीं थी? पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान कई लुभावने वायदे कर गए कि पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी का एक केन्द्र बाड़मेर में भी होगा... स्किल्ड मैन पॉवर तैयार होंगे..वगैरह-वगैरह...
अच्छा होता कि ये काम तो शुरु हो जाता...बाड़मेर में जहां रिफाइनरी लगनी है, वहां स्मार्ट सिटी प्लानिंग को लेकर काम शुरु हो जाता... विकास के बड़े प्रतिमान कायम करने की होड़ में जमीन तैयार करना क्यों भूल जाती हैं आती-जाती सरकारें? मूल लागत, प्रोजेक्ट की वाईबिलिटी, ब्याज, सूद, कर्ज सब आर्थिक पहलू नकारे नहीं जा सकते। लेकिन इन मुद्दों का शोर ज्यादा है..। आम जनता को सीधे इससे सरोकार इसीलिए नहीं है क्योंकि पांच साल में एक बार वोट देकर ये जिम्मेदारी सरकार को सौंप देती है। जनता को चाहिए रोजगार की गारंटी, विकास की गारंटी, लुभावने वायदों की शक्ल में नहीं...बल्कि पुख्ता एक्शन प्लान की शक्ल में... क्या रिफाइनरी को लेकर दावे करने वाली सरकारों ने आम जनता के सरोकारों का कोई एक्शन प्लान दिया है?
क्या आज मोदी राजस्थान के लोगों के भविष्य को लेकर कुछ और कह सकते थे? क्या राजस्थान का नेतृत्व पुरानी सरकार को कोसने की रवायत के साथ विकास का कोई नया विजन जनता के सामने रख पाई? क्या 40 हजार करोड़ बचाने की वाहवाही लेने जा रही सरकार ने चार साल की देरी में हुए नुकसान का आंकलन करवाया? क्या पिछली सरकार ने वाकई बिना किसी तैयारी के रिफाइनरी का शिलान्यास करवा लिया... अगर ये वाकई सच है तो क्या योजना को रद्द करने का कदम ही काफी है..? लोकतंत्र में सरकारों के वायदे, सरकारों के कदम कैसे विश्वसनीय बनें? राजस्थान की रिफाइनरी का मुद्दा, इस सवाल को भी पुनर्जीवित कर रहा है।