जयपुर

VIDEO: राजस्थान का ये Ex-Army ऑफिसर भिखारियों सी ज़िन्दगी जीने को मजबूर, फुटपाथ बन गया है नया ठिकाना

राजस्थान के कोटा में जन्में Ex ARMY officer रविंद्र कुमार बाली अब फुटपाथ पर रहने को हैं मजबूर, जानें कैसे बने ये हालात
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Updated: 3 Oct 2017, 3:01 PM IST
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जयपुर/ पुणे।

सेवानिवृत्त होने के बाद हर कोई एक सुखद और अच्छी तरह से जीवन यापन करने की सोचता है, लेकिन आर्मी में कैप्टन रहे 67 वर्षीय रविंद्र कुमार बाली के लिए ऐसा होना दूर की कौड़ी साबित होकर रह गया है। दरअसल, राजस्थान के कोटा में जन्में रविंद्र बाली इन दिनों भिखारियों जैसी ज़िन्दगी जीने को मजबूर हो रहे हैं। कभी रौब से रहने वाले इस ऑफिसर का वर्त्तमान पता अब पुणे छावनी स्थित ऑफिसर्स मेस के बाहर का फुटपाथ है।

रविंद्र बाली को इस तरह से सड़क किनारे फुटपाथ पर रहते हुए लगभग पांच साल हो गए हैं। यहां वो महज़ एक छोटे से प्लास्टिक शीट के नीचे रह रहे हैं जिससे वो बारिश और तेज़ धूप से खुद का बचाव कर सकें। इसके अलावा उनके पास एक बिस्तर है ताकि वो कुछ पल सुकून से रात को सो सकें।


लेकिन, इन तमाम परिस्थितियों के बावजूद चौंकाने वाली बात तो ये है कि बाली को किसी से भी कोई परेशानी या शिकायत नहीं है। इन हालातों के लिए वे अपने भाग्य के साथ ही करियर के दौरान किए गए कुछ गलत निर्णयों को वजह मानते हैं।

यहां जानें 'कप्तान' रविंद्र बाली के जीवन के बारे में

रविंद्र बाली का जन्म राजस्थान के कोटा में हुआ। वे पिता की दूसरी शादी से हुई संतान हैं। पिता पुलिस अधिकारी थे। स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने जून 1970 में बतौर कैडेट, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) ज्वाइन किया। यहां उन्होंने चार साल कड़ी मेहनत की और फिर अगले चार साल कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (सीएमई), पुणे में बिताए। इसके बाद, उन्हें पहली पोस्टिंग फिरोजपुर जिले के हुसैनीवाला बॉर्डर म्यूज़ियम में मिली।

हालांकि, बाली के करियर के बीच कई तरह की दिक्कतें आईं। उनके माता-पिता बीमार रहते थे जिनकी देखभाल करना ज़रूरी हो गया था। परिजनों की बिमारी को लेकर उन्हें जानकारी मिलती रहती थी। उनके छह सौतेले भाई-बहनों ने माँ-पिता को पैतृक घर से बेदखल कर दिया जिसकी सूचना उन्हें मिली। इन तमाम परेशानियों के चलते उन्होंने अपने माता-पिता की देखभाल की मंशा से 1988 में इस्तीफा दे दिया।


ऐसे शुरू हुए बुरे दिन

बाली ने चूंकि सेवाकाल के 20 वर्ष पूरे नहीं किये थे, लिहाज़ा वे स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के लिए हकदार नहीं रहे और न ही वे पेंशन योजना के लिए योग्य थे। बाली ने अपनी अब तक की गई जमा राशि को माता-पिता का इलाज में खर्च कर दिया। लेकिन बावजूद इसके कुछ समय बाद माँ-पिताजी की भी मौत हो गई। उस समय तक बाली अविवाहित थे, ऐसे में उन्होंने बाकी बचा जीवन भी बिना हमसफ़र के ही पूरा करने का फैसला लिया।

घर से किया गया बेदखल

इसके बाद रविंद्र बाली पैतृक घर के लिए हक़ की लड़ाई में लग गए। लेकिन, मां-पिताजी की तरह उनके सौतेले भाई-बहनों ने उन्हें भी घर से बेदखल कर दिया। कानूनी व्यवस्था में हो रही देरी के चलते उन्होंने सभी तरह के विवादों से खुद को दूर रखने का फैसला लिया और वो गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के पास प्रभास पाटन में रहने लग गए।


बीपीओ कंपनी में मिली नौकरी

उन्होंने कुछ स्थानीय लोगों की मदद से मछली व्यवसाय का काम शुरू किया। यहां, बाली ने दस साल बिताए, जो कमाया वो खर्च करते गए, यानी बचत के नाम पर कुछ नहीं। इसके बाद वे कोई दूसरा रोज़गार तलाशने के लिए पुणे पहुंच गए। यहां कुछ पुराने दोस्तों की मदद से वे कल्याणी नगर स्थित एक बीपीओ कंपनी में शामिल हो गए।

... लेकिन नियति को नहीं था मंज़ूर

बाली कहते हैं, "बीपीओ के साथ काम करते समय मैंने अपने जीवन में स्थिरता हासिल की। मैंने एक 1-बीएचके का घर खरीदने का फैसला किया। मैंने होम लोन लेकर घर खरीद भी लिया। लेकिन यहां भी, शायद नियति को मेरी शांतिप्रिय ज़िन्दगी मंज़ूर नहीं थी। 2012 के आसपास, बीपीओ बंद हो गई और मैं फिर से बेरोजगार बन गया। इसके चलते लोन की मासिक ईएमआई का भुगतान करने में असमर्थ हो गया। इसके बाद बढ़ती उम्र के चलते और कोई नौकरी नहीं कर सका। मैं बुढ़ापे के कारण और नौकरी सुरक्षित नहीं कर सका। इस बीच मैंने अपनी पूरी बचत राशि भी खर्च कर दी।"


कुदरत ने भी मोड़ा मुंह

इसके बाद दर-दर भटकते हुए बाली साल 2013 में केरल पहुंच गए। बाली बताते हैं कि यहां कुदरत ने भी उनका साथ नहीं दिया और उनके सभी ज़रूरी दस्तावेज़ एक तेज़ बरसात में खराब हो


फुटपाथ बना नया ठिकाना

बाली आगे कहते हैं, ''मेरे पास क्योंकि कोई पहचान नहीं थी, इसलिए मैंने केरल छोड़ दिया और वापस पुणे लौट आया। यहां फुटपाथ पर रहने लगा। भगवान की दया से मैं अभी बचा हुआ हूं। स्थानीय लोग मुझे भोजन और पानी दे देते हैं। ज़्यादा बरसात आती है तो पड़ोस के बंगलों के पोर्च की शरण ले लेता हूं। अंग्रेजी में मेरे धाराप्रवाह होने और बुढ़ापे को देखते हुए लोग मेरी मदद करते हैं। मैं पूरा दिन अंग्रेजी अखबार पढ़कर बिताता हूं।"


बाली अपनी स्थिति पर पछतावा नहीं करते क्योंकि वह अभी भी खुश और स्वस्थ है। वो कहते हैं कि, "मैं इस फुटपाथ पर ही अपने इस भाग्य के साथ मरना चाहता हूं।"

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