
जयपुर। राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की एंट्री पर बैन और जर्जर स्कूल भवनों की हालत को लेकर कांग्रेस ने गुरुवार को पैदल मार्च निकाला। राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने से पहले कांग्रेसी विधायकों और कार्यकर्ताओं ने मूक-बधिर पोद्दार स्कूल से विधानसभा तक पैदल मार्च निकाला। इस दौरान पुलिस ने पैदल मार्च रोकने के लिए बैरिकेडिंग की। लेकिन, कुछ विधायक बैरिकेडिंग पर चढ़ गए। पैदल मार्च में शामिल विधायकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ता भी मौजूद रहे, जो बैरिकेडिंग पार करके विधानसभा की ओर बढ़े।
पहली बार ऐसा हुआ कि प्रदर्शनकारी विधानसभा के पास पहुंच गए। इस दौरान पुलिस ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को विधानसभा की ओर जाने से रोका। तभी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच हल्की झड़प हुई।
कुछ देर चले हंगामे के बाद सिर्फ कांग्रेसी विधायक ही पैदल मार्च के रूप में विधानसभा की ओर आगे बढ़े। फिर राजस्थान विधानसभा के बाहर धरने पर बैठ गए। वहीं, मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देने की मांग को लेकर बाप विधायकों ने विधानसभा के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया।
राजस्थान में विपक्ष के नेता टीकाराम जूली ने शिक्षा विभाग के फरमान को काला कानून बताते हुए इस रद्द करने की मांग की। साथ ही स्कूलों की हालत सुधारने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि बच्चों की आवाज दबानी नहीं चाहिए। भजनलाल सरकार को अपना बजट बढ़ाना चाहिए। जूली ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को बच्चों की शिक्षा की कोई परवाह नहीं है। इससे पहले विपक्ष के नेता टीकाराम जूली ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने आज का दिन छात्रों और उनके हितों की लड़ाई के लिए समर्पित किया है। साथ ही लोगों से भी पदैल मार्च मार्च में जुड़ने का आह्वान किया।
दरअसल, शिक्षा विभाग की ओर से राजस्थान के 70 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है। ऐसे में सरकारी स्कूलों के जर्जर भवन, घटिया पोषाहार, मोबाइल देखते स्टाफ और खाली पड़ी कक्षाओं की खबरें और फोटो-वीडियो आमजन तक नहीं पहुंचेंगी। क्योंकि स्कूलों की खामियां दूर करने के बजाय सरकार ने उन्हें छिपाना चाहती है। इसी आदेश का कांग्रेस का विरोध कर रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पिछले दिनों प्रदेश में स्कूलों की व्यवस्थाओं को लेकर विद्यार्थियों के आक्रोश व्यक्त करने और सड़क पर
प्रदर्शन करने जैसी घटनाओं के चलते बच्चों की आवाज दबाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
शिक्षा निदेशक ललित कुमार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि प्रधानाचार्य की पूर्व अनुमति के बिना विद्यार्थियों, शिक्षकों या स्कूल की फोटो, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग या लाइव स्ट्रीमिंग नहीं की जा सकेगी। विद्यार्थियों की फोटो का संग्रह, प्रकाशन या प्रसार भी प्रतिबंधित रहेगा। प्रधानाचार्य की अनुमति से ही प्रवेश मिलेगा और रजिस्टर में एंट्री होगी। यही नहीं आदेश में बिना अनुमति आने या जाने से इनकार करने पर पुलिस को सूचना देकर उसके खिलाफ किशोर न्याय व सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अलावा पॉक्सो तक में मुकदमा दर्ज करवाने के निर्देश दिए हैं।
इस फैलसे के खिलाफ सियासत तेज होने पर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने सरकार के निर्णय का बचाव करते हुए कहा था कि स्कूलों में नाबालिग छात्र-छात्राएं होते हैं, इसलिए उनकी फोटो या इंटरव्यू के लिए सामान्यतः अभिभावकों की अनुमति जरूरी होती है। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति विद्यालय में प्रवेश नहीं कर सकता। आवश्यक होने पर संस्था प्रधान से लिखित अनुमति लेनी होगी। दिलावर के अनुसार यह व्यवस्था बच्चों की सुरक्षा, निजता और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए की गई है।