जयपुर

संपादकीय: डेटा सुरक्षा के लिए स्वदेशी विकल्पों पर देना होगा जोर

चुनावों तक को प्रभावित करने के आरोप इन विदेशी प्लेटफॉम्र्स पर लगते रहे हैं। इन्हीं चिंताओं के चलते यूरोप के कई देशों ने वर्ष 2027 तक जूम, माइक्रोसॉफ्ट टीम्स और वेबेक्स जैसे अमरीकी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग टूल्स का उपयोग बंद करने का निर्णय लिया है।

2 min read
Feb 06, 2026

डिजिटल सुरक्षा का मुद्दा दुनिया के तमाम उन देशों के लिए ज्यादा चिंता का विषय बना हुआ है, जहां विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स का दबदबा कायम हो चुका है। भारत समेत तमाम दूसरे देशों के डेटा पर भी अमरीकी कंपनियों का कब्जा है। फेसबुक, एक्स और गूगल जैसे प्लेटफार्म से डेटा सुरक्षा पर आ रहे संकट को देखते हुए अब कई देश विदेशी टेक टूल के इस्तेमाल को धीरे-धीरे या तो सीमित कर रहे हैं या इन्हें बंद कर स्वदेशी और ओपन सोर्स को अपनाने में जुट गए हैं।
यह जरूरत इसलिए भी आ गई है कि विदेशी प्लेटफॉर्म न केवल भ्रामक जानकारियों को परोसने का काम कर रहे हैं, बल्कि आर्थिक तौर पर भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। चुनावों तक को प्रभावित करने के आरोप इन विदेशी प्लेटफॉम्र्स पर लगते रहे हैं। इन्हीं चिंताओं के चलते यूरोप के कई देशों ने वर्ष 2027 तक जूम, माइक्रोसॉफ्ट टीम्स और वेबेक्स जैसे अमरीकी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग टूल्स का उपयोग बंद करने का निर्णय लिया है। हमारे यहां भी पिछले लोकसभा चुनावों के दौर में विदेशी सोशल मीडिया पर फेक न्यूज और डीपफेक वीडियो फैलाने के आरोप खूब लगे थे। यह भी कहा गया था कि इनसे मतदाताओं को गुमराह करने का काम भी किया गया। सच तो यह है कि एल्गोरिद्म नफरत भरी सामग्री को बढ़ावा देते हैं। कई बार युवाओं में तनाव, अवसाद, चिंता और आत्मसम्मान की कमी से जूझने के मामले भी देखे गए हैं।

यही वजह है कि नेपाल, इंडोनेशिया और मोरक्को जैसे छोटे देशों में भी डेटा प्राइवेसी के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। भारत में भी विदेशी प्लेटफार्मों के जरिए परोसी जाने वाली सामग्री के खतरे कम नहीं हैं। फर्जी खबरें समाज में वैमनस्य फैलाने का काम तो करती ही है, एक खतरा यह भी है कि अमरीकी कंपनियां हमारे डेटा का इस्तेमाल कर बाजार में एकाधिकार कायम करती हैं, जिससे भारतीय स्टार्टअप पिछड़ जाते हैं। चूंकि यूरोप इस खतरे को समझ चुका है, इसलिए वहां डेटा एक्ट, एआइ एक्ट और एनआइएस 2 जैसे कानून लागू हो रहे हैं।


भारत में भी डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 विदेशी कंपनियों को भारत में डेटा स्टोर करने को बाध्य करता है, लेकिन इसका सख्त क्रियान्वयन जरूरी है। चूंकि 12 लाख केंद्रीय कर्मचारियों के ई-मेल जोहो मेल पर शिफ्ट हो चुके हैं, इसलिए इसी तर्ज पर सोशल मीडिया और मैपिंग के लिए स्वदेशी विकल्प अपनाए जाने चाहिए। राष्ट्रीय डेटा नीति बनाई जाए, ताकि निजता का अधिकार सुरक्षित रहे। डिजिटल संप्रभुता अब केवल तकनीकी या आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक स्थिरता से भी जुड़ा प्रश्न बन चुका है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए यह आवश्यक है कि डेटा के संग्रह, भंडारण और उपयोग से जुड़े नियम पारदर्शी और कठोर हों।

Published on:
06 Feb 2026 03:13 pm
Also Read
View All

अगली खबर