
दावणगेरे. सुपाश्र्वनाथ जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मासिक धर्मसभा में आचार्य राजरक्षितसूरि ने कहा कि जैसे फैमिली डॉक्टर शरीर की देखभाल करता है और फैमिली वकील कानूनी समस्याओं का समाधान करता है, उसी प्रकार फैमिली गुरु आत्मा का कल्याण कर मनुष्य के परलोक को संवारने का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि माता-पिता का आशीर्वाद और सद्गुरु की कृपा जीवन की सबसे बड़ी संपदा है, जबकि उनकी अवमानना करने वाला व्यक्ति कभी वास्तविक सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। आचार्य राजरक्षितसूरि ने कहा कि भगवान राम के गुरु महर्षि वशिष्ठ, अकबर के मार्गदर्शक आचार्य हीरसूरि तथा राजा कुमारपाल के गुरु आचार्य हेमचंद्राचार्य थे। वहीं नेपोलियन गुरु के अभाव में जीवन के अंतिम समय तक कष्ट झेलता रहा। उन्होंने आचार्य हरिभद्रसूरि, उनके शिष्य हंस और परमहंस मुनि, तथा गुणसेन एवं अग्निशर्मा के प्रसंग के माध्यम से बताया कि सच्चा पश्चाताप मनुष्य को महान बना देता है। गुरु के आदेश पर आचार्य हरिभद्रसूरि ने 1444 ग्रंथों की रचना कर जैन साहित्य को अमूल्य धरोहर प्रदान की।उन्होंने कहा कि पाप का अहसास और निष्कपट प्रायश्चित्त ही आत्मशुद्धि का वास्तविक मार्ग है। धर्मसभा में 7 अगस्त को प्रभु-मिलन तथा 9 अगस्त को बकेश्वर हॉल में आयोजित एल.टी.एस. शिविर की जानकारी दी गई, जिसमें पंन्यास नयरक्षित विजय "इट्स माय लाइफ" विषय पर युवाओं का मार्गदर्शन करेंगे।