
कोप्पल. कोप्पल स्थित जीरावला भवन में आयोजित धर्मसभा में मुनि अनंत कुमार ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मजागरण और आत्मोन्नति का श्रेष्ठ काल है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर के अंतिम उपदेश में सम्यक्त्व, पराक्रम और अध्ययन को आत्मकल्याण का आधार बताया गया है। धर्म के प्रति जागृत उत्साह ही संवेग है, जो मनुष्य को परम दुर्लभ धर्मश्रद्धा की ओर अग्रसर करता है। मुनि अनंत कुमार ने बताया कि गौतम द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में भगवान महावीर ने स्पष्ट किया था कि संवेग से आत्मा अनुत्तर धर्मश्रद्धा प्राप्त करती है। यह ऐसी श्रद्धा है, जो एक बार जागृत हो जाए तो फिर कभी समाप्त नहीं होती। उन्होंने शुद्ध मधु का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे उसका स्वाद सदैव मधुर रहता है, उसी प्रकार सच्ची श्रद्धा आत्मा का स्थायी गुण बन जाती है। धर्मसभा में मुनि जैनम कुमार ने आत्मा और कर्म के गहन संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सम्यक श्रद्धा से युक्त व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, बल्कि हर परिस्थिति में आत्मस्वभाव, ज्ञान, दर्शन और आनंद का अनुभव करता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने जीवन में अटूट धर्मश्रद्धा को विकसित कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढऩे का आह्वान किया।