सरदारशहर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस अपनी परंपरागत सीट बचाने में कामयाब रही। कांग्रेस ने वर्ष 1998 के चुनावों के बाद इस उपचुनाव में सर्वाधिक मतों से जीत दर्ज की है। यहां प्रथम चुनाव से लेकर अब तक हुए चुनाव में कांग्रेस ने 11 बार जीत दर्ज की है। कांग्रेस के इस चुनाव की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार मॉनिटरिंग कर रहे थे, जिसका सीधा लाभ प्रत्याशी को मिला।
पत्रिका न्यूज नेटवर्क/जयपुर। सरदारशहर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस अपनी परंपरागत सीट बचाने में कामयाब रही। कांग्रेस ने वर्ष 1998 के चुनावों के बाद इस उपचुनाव में सर्वाधिक मतों से जीत दर्ज की है। यहां प्रथम चुनाव से लेकर अब तक हुए चुनाव में कांग्रेस ने 11 बार जीत दर्ज की है। कांग्रेस के इस चुनाव की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार मॉनिटरिंग कर रहे थे, जिसका सीधा लाभ प्रत्याशी को मिला। दूसरा कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर के कारण जीत का आंकड़ा बढ़ा। भाजपा यहां अब तक मात्र दो बार ही चुनाव जीत सकी है।
आरएलपी का असर
आरएलपी लगातार राजस्थान में संगठन को मजबूत करने और चुनावों में प्रत्याशी उतारने का काम कर रही है। उपचुनावों में लगातार आरएलपी का प्रदर्शन लगातार सुधर रहा है। सरदारशहर सीट पर प्रत्याशी उतार आरएलपी ने चुनाव को रोचक बना दिया। आरएलपी प्रत्याशी को यहां 22.28 प्रतिशत वोट मिले हैं। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए आरएलपी के लिए यह परिणाम उत्साहित करने वाला है। पिछले चुनाव में आरएलपी प्रत्याशी को यहां मात्र 5.04 प्रतिशत वोट ही मिले थे।
रिणवा की घर वापसी भी नहीं आई काम
चुनाव में रतनगढ़ तहसील की सरदारशहर में जुड़ी 11 पंचायतों के वोटों को साधने के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पूर्व मंत्री राजकुमार रिणवा को वापस पार्टी में लिया था। उनको भाजपा में शामिल करने के पीछे भी वोटों का गणित था, लेकिन रिणवा की भाजपा में वापसी का प्रभाव भी इन 11 पंचायतों में कहीं नजर नहीं आया। विधायक अभिनेष महर्षि की पकड़ भी इन क्षेत्रों में बेहद कमजोर नजर आई।
इसके अलावा सांसद राहुल कस्वा, तीन बार सांसद रह चुके रामसिंह कस्वा भी जाट मतों को साधने में कामयाब नहीं हो सके। केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल एससी मतदाताओं को साधने के लिए आए तो सही, लेकिन उनका जादू भी नहीं चल पाया। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया और राजेन्द्र राठौड़ का गृह जिला होने के बावजूद पार्टी बुरी तरह से हार गई।