गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली की जुगलबंदी से राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में नई हलचल तेज हो गई है। संगठन और विधानसभा समन्वय के इस नए समीकरण से पार्टी में ऊर्जा और आक्रामक तेवर लौटने के संकेत मिल रहे हैं। सत्ता के संतुलन में भी बदलाव माना जा रहा है।
Rajasthan Congress: राजस्थान की राजनीति में हमेशा से चेहरों का बड़ा महत्व रहा है। पिछले दो दशकों तक जहां कांग्रेस की राजनीति अशोक गहलोत और सचिन पायलट के इर्द-गिर्द घूमती रही। वहीं, अब रेगिस्तानी राज्य के सियासी गलियारों में एक नई 'पावर जोड़ी' की चर्चा जोरों पर है, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली।
चाहे वह मतदाता सूची (SIR) में गड़बड़ी के आरोप लगाकर भाजपा को घेरना हो या लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की वापसी कराना। डोटासरा और जूली की जोड़ी ने राजस्थान कांग्रेस में अपना दबदबा साबित कर दिया है।
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2024 के लोकसभा चुनावों ने राजस्थान के राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था। जहां 2014 और 2019 में भाजपा ने सभी 25 सीटें जीती थीं। वहीं, 2024 में भाजपा 14 पर सिमट गई और कांग्रेस गठबंधन ने 11 सीटों पर कब्जा किया।
इस बड़ी जीत के पीछे डोटासरा और जूली की जाट-दलित रणनीति को माना जा रहा है। गोविंद सिंह डोटासरा एक प्रभावशाली जाट नेता के रूप में उभरे हैं। वहीं, टीकाराम जूली राजस्थान के पहले दलित नेता प्रतिपक्ष हैं। इन दोनों ने मिलकर पारंपरिक रूप से भाजपा की ओर झुके हुए इन समुदायों को कांग्रेस के पाले में लाने में सफलता हासिल की। सूत्रों के अनुसार, डोटासरा ने आलाकमान को पहले ही भरोसा दिलाया था कि कांग्रेस 10 से अधिक सीटें जीतेगी, जो सच साबित हुआ।
अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की खींचतान ने पिछले 5 सालों में कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया था। लेकिन अब विपक्ष में रहते हुए डोटासरा और जूली एक 'यूनाइटेड फ्रंट' पेश कर रहे हैं। दोनों नेता न केवल जयपुर बल्कि दिल्ली में भी साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, जिससे कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि पार्टी अब एकजुट है।'SIR' विवाद : सरकार को घेरने की नई रणनीति
हाल ही में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को लेकर डोटासरा और जूली ने मोर्चा खोल रखा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा 'गुप्त योजना' के तहत कांग्रेस समर्थित मतदाताओं के नाम काट रही है। 19 जनवरी को दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में डोटासरा ने सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा, जो विपक्ष के बढ़ते हुए आक्रामक तेवरों को दर्शाता है।
डोटासरा को केवल एक आक्रामक नेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने राजस्थान कांग्रेस के ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है, जैसे कि जिलों का विस्तार कर संगठनात्मक इकाइयों को 40 से बढ़ाकर 50 किया गया। नियुक्तियां सर्वे और फीडबैक के आधार पर की गईं, न कि केवल स्थानीय विधायक की सिफारिश पर। बूथ से लेकर राज्य स्तर तक कार्यकर्ताओं का डेटा अब जयपुर मुख्यालय में उपलब्ध है। इस 'पायलट प्रोजेक्ट' की सफलता से दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान इतना प्रभावित है कि इसे अन्य राज्यों में भी लागू करने की तैयारी है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि डोटासरा और जूली के बढ़ते कद से पार्टी के कुछ पुराने और वरिष्ठ नेता असहज महसूस कर रहे हैं। हनुमान बेनीवाल जैसे क्षेत्रीय नेताओं का प्रभाव कम होना और जाट-दलित वोटों का सीधा कांग्रेस की ओर आना, इन दोनों नेताओं की व्यक्तिगत उपलब्धि माना जा रहा है।
अब सबकी नजरें अप्रैल 2026 में होने वाले शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों पर टिकी हैं। यह चुनाव तय करेंगे कि डोटासरा और जूली की यह जोड़ी क्या निचले स्तर पर भी कांग्रेस की जीत बरकरार रख पाएगी और क्या वे भविष्य में भी पार्टी को इसी तरह एकजुट रख पाएंगे।