
जयपुर: हाईकोर्ट ने 63 साल पुराने मुकदमे के अभी तक लंबित होने और राजस्व अदालतों में सालों से लंबित मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि न्याय में देरी होना न्याय से इनकार के समान है। न्यायाधीश अनूप कुमार ढंढ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मानव जीवन का दायरा छोटा और सीमित होता है, जबकि मुकदमेबाजी असीमित और अमर होती है। एक व्यक्ति थोड़े समय के लिए जीता है, लेकिन मुकदमे पीढ़ियों तक चलते रहते हैं और उन्हें शुरू करने वाले वादी की भी मृत्यु हो जाती है। अदालत ने कहा कि यह मामला इस कड़वी सच्चाई का एक ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे न्याय मिलने में देरी व्यवस्था का एक गंभीर पहलू बन चुकी है।
पूरा विवाद दौसा के पाटरखेड़ा गांव की भूमि से जुड़ा हुआ है। इस जमीन पर कब्जे को लेकर करीब 63 साल पहले 1963 में आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के तहत कार्यवाही आरंभ हुई थी। इसके बाद से परिवार जमीन के स्वामित्व को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। मामले के मूल पक्षकार जयराम 86 वर्ष के हैं।
इस लंबी अवधि के दौरान मुकदमे से जुड़े कई पक्षों की मृत्यु हो चुकी है, जिसके बाद उनके कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लेना पड़ा। अदालत ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि इस मानसिकता को बदला जाए, जहां मामले दादाओं द्वारा दायर किए जाते हैं और फैसले उनके पोते सुनते हैं।
अदालत ने इस आदेश की एक प्रति अतिरिक्त मुख्य सचिव (कार्मिक विभाग), संभागीय आयुक्त (जयपुर), जिला कलक्टर (दौसा) और रजिस्ट्रार (राजस्व मंडल) को अनुपालन के लिए भेजने का निर्देश दिया है और मामले की अनुपालन रिपोर्ट के लिए 18 दिसंबर 2026 की तारीख तय की है।
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए उपखंड मजिस्ट्रेट, मंडावर, जिला दौसा को कड़े निर्देश दिए हैं कि वह लंबित शिकायत का यथाशीघ्र, तीन महीने के भीतर हर हाल में निस्तारण करें। अदालत ने यह भी चेताया है कि यदि भविष्य में किसी भी पक्ष ने स्थगन के लिए अनावश्यक अनुरोध किया, तो उस पर भारी कॉस्ट लगाई जाएगी। इसके अलावा, संबंधित पीठासीन अधिकारी को चेतावनी दी गई है कि यदि तय सीमा में बिना किसी ठोस कारण के मामला तय नहीं किया गया, तो उच्च स्तर पर प्रतिकूल कार्रवाई की जा सकती है।