जयपुर

संपादकीय: उच्च शिक्षा में दाखिले से पहले सही मार्गदर्शन जरूरी

फाइनेंस ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक- 2026 के आंकड़े बताते हैं कि सफलता की गारंटी मानी जा रही डिग्री अब युवाओं के लिए बोझ बनती जा रही है।

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Apr 25, 2026

शिक्षा नौकरी के लिए या ज्ञान के लिए, यह भारत के युवाओं के लिए एक 'यक्षप्रश्न' बना हुआ है। आर्थिक नीतियों ने प्रति व्यक्ति उत्पादन के मद्देजनर शिक्षा की जरूरत पर बल दिया है। जीडीपी आधारित शिक्षा पर होने वाला खर्च निवेश माना जाने लगा है। माता-पिता संतान को ज्ञानवान और सुसंस्कृत बनाने के लिए खर्च नहीं कर रहे, बल्कि एक ऐसा निवेश करने लगे हैं जिससे भविष्य में मुनाफा हो सके। यही वजह है कि आज के युवा अपनी रुचियों और क्षमताओं से ज्यादा उस क्षेत्र में 'डिग्री' चाहते हैं जिसमें ऊंची सैलरी मिल सके। लेकिन तब क्या हो जब पढ़ाई पूरी करने के बाद पता चले कि हासिल की गई डिग्री का अब पहले जैसा महत्त्व नहीं रहा और शिक्षा पर किए गए निवेश की रकम निकालने में ही वर्षों बीत जाएं। यदि बैंक से कर्ज लेकर पढ़ाई की गई है तो 'करेला और नीम चढ़ा' की कहावत ही चरितार्थ होगी। फाइनेंस ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक- 2026 के आंकड़े बताते हैं कि सफलता की गारंटी मानी जा रही डिग्री अब युवाओं के लिए बोझ बनती जा रही है। बी.टेक, एमबीए और सीए जैसे प्रतिष्ठित कोर्स आज 'रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट' के मोर्चे पर कमजोर पड़ते जा रहे हैं।
पूरी दुनिया में कागजी डिग्री हासिल करने की होड़ पैदा करने के बाद दिग्गज उद्योगपति अब इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि ऐसी डिग्री उनके काम की नहीं है। नए उद्योग अब कौशल की मांग कर रहे हैं।

युवाओं के जिज्ञासु दिमाग और पहल करने की क्षमता को कुंद करने वाली भेड़चाल के बाद कौशल आधारित शिक्षा की नई परिपाटी रखी जा रही है। नया करने की क्षमता को परखा जा रहा है और अपारंपरिक सोच और रचनात्मकता को महान माना जाने लगा है। एक तरह से अच्छा भी है। लेकिन, उनका भविष्य क्या होगा जो भेड़चाल में समय गंवा चुके हैं। दिग्गज 'जॉब क्रिएटर्स' का यह नया मिजाज भारत के लिए मौका भी बन सकता है और अवसाद की वजह भी। सबसे ज्यादा मार उन गरीब व मध्यवर्गीय परिवार के युवाओं पर पड़ेगी, जो कर्ज लेकर या पारिवारिक गहने गिरवी रख पढ़ाई पर निवेश कर रहे हैं। उन्हें उचित सलाह और मार्गदर्शन देने वाला भी कोई नहीं है। सरकारों ने यह काम निजी शैक्षणिक संस्थाओं के भरोसे छोड़ रखा है, जिनकी पहली चिंता ज्यादा मुनाफा कमाना है।

जाहिर है सरकारों को आगे आना होगा। युवाओं को समय रहते गाइड करना होगा। उच्च शिक्षा संस्थानों में नामांकन के लिए सीटों की संख्या का तार्किक निर्धारण करना होगा। नए-नए कौशल विकसित करने होंगे और इसकी एक सतत प्रक्रिया सुनिश्चित करनी होगी। आज जिस एआइ ने पूरे जॉब मार्केट को हिला रखा है, उसके संभावित असर को यदि पहले ही समझ लिया गया होता तो अपेक्षाकृत कम मांग वाले क्षेत्रों में ऊंची-ऊंची डिग्री रखने वालों को नौकरी के लिए धक्के नहीं खाने पड़ते। देर जरूर हो गई है पर तुरंत इस पर ध्यान देकर सरकार नुकसान को कम कर सकती है।

Published on:
25 Apr 2026 04:13 pm
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