हार्वर्ड प्रोफेसर एल्किन्स ने बताया कि ब्रिटिश साम्राज्य में दस्तावेज़ नष्ट कर सच्चाई छुपाई गई, लेकिन कोर्ट ने 50 साल बाद भी निष्पक्ष सुनवाई कर 20 मिलियन पाउंड मुआवजा और यातना की आधिकारिक स्वीकृति दी।
जयपुर: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन फ्रंट लॉन में ‘द लीगेसी ऑफ वॉयलेंस’ विषय पर आयोजित सेशन में पुलित्जर पुरस्कार विजेता हार्वर्ड प्रोफेसर कैरोलिन एल्किन्स ने कहा, हिंसा की व्यवस्थाएं समय के साथ समाप्त नहीं होतीं, बल्कि नए रूपों में आगे बढ़ती हैं। ब्रिटिश साम्राज्य में राज्य प्रेरित हिंसा किसी एक-दो घटनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि एक सुव्यवस्थित और संस्थागत पैटर्न का हिस्सा थी, जिसकी विरासत आज भी विश्व के कई हिस्सों में दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि इतिहास केवल अतीत नहीं है। प्रशासनिक हिरासत जैसे कानून, जो औपनिवेशिक दौर में बने, आज भी कई क्षेत्रों में लागू हैं। उन्होंने बताया कि उनके शोध का सबसे महत्त्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब मध्य केन्या के हाइलैंड्स के 5 बुजुर्ग पीडि़तों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लंदन हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया। इस केस में मुख्य प्रतिवादी फॉरेन एंड कॉमनवेल्थ ऑफिस था। अदालत में यह साबित करना अनिवार्य था कि हत्या, यातना और यौन उत्पीडऩ की घटनाएं अलग-अलग या आकस्मिक नहीं थीं, बल्कि राज्य-प्रायोजित हिंसा की एक सुनियोजित प्रणाली के तहत हुई थीं, जिसकी जानकारी सरकार के सर्वोच्च स्तर तक थी।
उनका कहना था कि शोध के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि अभिलेखागार से हजारों और लाखों फाइलें गायब थीं। सालों तक यह कहा जाता रहा कि ये दस्तावेज 'गुम हो गए' या 'गलत जगह रख दिए गए’। उनका कहना था कि इस तरह की भाषा सत्ता को जवाबदेही से बचाने का माध्यम बन जाती है। कानूनी दबाव के बाद 300 ऐसे बॉक्स सामने आए, जिनमें पहले कभी सार्वजनिक न किए गए दस्तावेज थे। साथ ही, 36 अन्य उपनिवेशों से जुड़ी लगभग 8,000 फाइलों के अस्तित्व का भी खुलासा हुआ, जिन्हें उपनिवेशवाद के अंत के समय अलग कर सुरक्षित रखा गया था।
एल्किन्स ने बताया कि केस के दौरान यह भी सामने आया कि लगभग साढ़े तीन टन दस्तावेज नष्ट किए गए थे। यह प्रक्रिया कई सालों तक चली, जिसमें फाइलों को स्थानांतरित करना, संग्रहित करना, जलाना और चुनिंदा रेकॉर्ड लंदन भेजना शामिल था। दस्तावेज जानबूझकर एक साथ नहीं दिए गए, बल्कि धीरे-धीरे और बिखरे हुए रूप में उपलब्ध कराए गए, जिससे सच्चाई को जोडऩा बेहद कठिन हो गया। एल्किन्स के अनुसार, केस की सबसे बड़ी कानूनी चुनौती स्टैच्यूट ऑफ लिमिटेशंस थी। टॉर्ट क्लेम में समय सीमा तीन वर्ष होती है, जबकि ये घटनाएं लगभग 50 साल पुरानी थीं। कानूनी जगत में शायद ही किसी को उम्मीद थी कि यह बाधा पार हो सकेगी, लेकिन अदालत के सामने यह साबित किया गया कि इतने सालों बाद भी निष्पक्ष सुनवाई संभव है, क्योंकि पर्याप्त प्रमाण अब भी मौजूद थे।
उन्होंने बताया कि यह मामला वसंत 2013 में सेटलमेंट तक पहुंचा। यह एक क्लास एक्शन सेटलमेंट था, जिसमें लगभग 2,000 पीडि़त शामिल थे। ब्रिटिश सरकार ने 20 मिलियन पाउंड स्टर्लिंग मुआवजे के रूप में देने पर सहमति जताई। सबसे महत्त्वपूर्ण यह रहा कि ब्रिटिश सरकार ने पहली बार औपचारिक रूप से यह स्वीकार किया कि ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान यातना का प्रयोग किया गया था।
एल्किन्स ने इसे इतिहास और जवाबदेही की दिशा में एक निर्णायक क्षण बताया। एल्किन्स ने बताया कि साम्राज्य में आपातकाल के नाम पर सामान्य कानून को निलंबित कर कार्यपालिका को असाधारण शक्तियां दी जाती थीं। बिना मुकदमे गिरफ्तारी, न्यायिक प्रक्रिया का निलंबन, प्रेस पर सेंसरशिप और निर्वासन जैसी व्यवस्थाएं लागू की जाती थीं। उन्होंने इसे 'लीगलाइज्ड लॉलेसनेस' कहा अर्थात गैरकानूनी व्यवहार को नए कानून बनाकर वैध बना देना।
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