जाट आरक्षण: बढ़ती ही जा रही है आंदोलन की आग

पुलिस के मुताबिक आरक्षण के इस आग में 1 व्यक्ति की मौत एवं लगभग 100 लोग घायल हो चुके हैं
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Updated: 20 Feb 2016, 4:03 PM IST
jat reservation
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जयपुर। हरियाणा में जाट आरक्षण हिंसक रूप ले चुका है। पुलिस के मुताबिक आरक्षण के इस आग में 1 व्यक्ति की मौत और लगभग 100 लोग घायल हो चुके हैं। हालात इतना भयावह हो गया है कि राज्य सरकार को सेना और पैरा मिलिट्री बलों को बुलाना पड़ा है। हरियाणा में जाट समुदाय ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के तहत आरक्षण की मांग कर रहा है। रोहतक, झज्जर, सोनीपत, भिवानी, हिसार, फ़तेहाबाद और ज़ींद ज़िलों तक प्रदर्शन फैल गए हैं। कई जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया है और उपद्रवी को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए हैं।

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ऐसा नहीं है कि आरक्षण को लेकर देश में पहली बार आंदोलन हो रहा है। इससे पहले भी आरक्षण की मांग को लेकर देश में बड़े-बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं। कई बार सरकारों ने आंदोलन को हिंसक होता देख आंदोलनकारियों के मांगों को मान लिया लेकिन बाद में कोर्ट ने सरकार के आदेशों को निरस्त कर दिया। एक ऐसा ही वाकया सामने आया था जब कोर्ट ने राजस्थान में दिए गए जाट आरक्षण को खारिज कर दिया था।

गौरतलब हो कि राजस्थान जाट आरक्षण से जुड़े मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। जाटों के अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षण के मामले पर राजस्थान हाईकोर्ट में दायर पीआईएल सहित आठ याचिकाओं पर फैसला करते हुए अदालत ने जाट आरक्षण जारी रखने का आदेश दिया। अदालत ने धौलपुर और भरतपुर के जाटों का आरक्षण रद्द किया। अदालत ने इसी के साथ चार माह में कमेटी बनाकर ओबीसी आरक्षण को रिव्यू करने का आदेश भी दिया था।

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राजस्थान हाईकोर्ट में जाटों को ओबीसी आरक्षण से बाहर करने सहित अन्य मामले पर रतनलाल बागड़ी ने जनहित याचिका एवं अन्य सात अन्य याचिकाएं पर बीते 16 साल से सुनवाई चल रही थी। मामले पर राजस्थान हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया था। मुख्य न्यायाधीश सुनील अंबवानी की अदालत ने 8 जुलाई से दस जुलाई तक लगातार दो दिन इसी मामले पर सभी पक्षों को सुना था।

सरकार की ओर से अटर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने जाट आरक्षण के पक्ष में तर्क रखे थे। वहीं, जाट समाज की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट से वरिष्ठ वकील पेश हुए थे। यह आदेश अदालत ने मामले पर सोमवार को आदेश जारी करते हुए जाटों का आरक्षण जारी रखने का आदेश दिया था। अदालत ने अपने आदेश में केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ध्यान में रखकर धौलपुर और भरतपुर के जाटों का आरक्षण रद्द कर दिया।

अदालत ने एक रिव्यू कमेटी बनाने का निर्देश दिया, जो चार माह में ओबीसी में शामिल सभी जातियों के आरक्षण का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के आधार पर रिव्यू करेगी। जाट आरक्षण फैसला पर जाट समाज के साथ ही ओबीसी में शामिल अन्य लोगों की नजर थी। अदालत के फैसले के बाद राज्य सरकार ने भी राहत की सांस ली थी।

गौरतलब हो कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2015 में एक अहम फ़ैसला देते हुए जाट समुदाय को दिए गए आरक्षण को रद्द कर दिया था। पिछली यूपीए सरकार ने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर जाटों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया था। अदालत ने इसे ग़लत ठहराते हुए कहा था कि तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट को नजरअंदाज़ किया। कोर्ट का कहना था कि ज़ाति आरक्षण देेने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन पिछड़ापन निर्धारित करने के लिए यह अकेले पर्याप्त नहीं है।

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