
कृषि भूमि पर बिना अनुमति व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करने के मामलों में सख्ती के बीच जयपुर विकास प्राधिकरण के अपीलीय अधिकरण ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया है कि संबंधित पक्ष फिलहाल किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि संचालित नहीं करेंगे। अगर उनके पास व्यावसायिक उपयोग की वैध अनुमति, स्वीकृति या अन्य संबंधित दस्तावेज हैं, तो उन्हें 15 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने जेडीए को भी निर्देश दिए हैं कि मामले में अंतिम निर्णय होने तक विवादित निर्माण के खिलाफ किसी प्रकार की कठोर कार्रवाई नहीं की जाए। यानी न तो निर्माण को सील किया जाएगा, न ध्वस्त किया जाएगा और न ही उसे किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाया जाएगा।
दरअसल, सांगानेर तहसील के चिमनपुरा गांव स्थित खसरा नंबर 149 और 151 से जुड़ा हुआ है। जेडीए ने 13 जुलाई को जयपुर विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1982 की धारा-32 के तहत नोटिस जारी किया था। नोटिस में आरोप लगाया गया कि कृषि भूमि पर बिना किसी वैध अनुमति के करीब 15×35 फीट क्षेत्र में फिजियोथेरेपी क्लीनिक संचालित किया जा रहा है। जेडीए के अनुसार यह भूमि कृषि उपयोग के लिए दर्ज है और उस पर व्यावसायिक गतिविधियां नियमों का उल्लंघन हैं। इसी नोटिस को चुनौती देते हुए संबंधित पक्ष ने जेडीए ट्रिब्यूनल में अपील दायर की थी।
वहीं इस मामले की सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने फिलहाल जेडीए की ओर से जारी नोटिस में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि अपीलकर्ताओं को अपना पक्ष रखने और सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का पूरा मौका मिलना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर अपीलकर्ताओं के पास व्यावसायिक उपयोग की वैध अनुमति या अन्य आवश्यक स्वीकृतियां उपलब्ध हैं। तो वे उन्हें 15 दिनों के भीतर सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके बाद सक्षम प्राधिकारी सभी दस्तावेजों और तथ्यों पर विचार करते हुए कानून के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित करेगा।
इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि जब तक धारा-32 के तहत चल रही कार्रवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक संबंधित पक्ष न तो कोई नया निर्माण करेंगे और न ही बिना भूमि उपयोग परिवर्तन (लैंड यूज कन्वर्जन) के किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि संचालित करेंगे। ऐसे में भूमि का उपयोग कृषि से व्यावसायिक श्रेणी में विधिवत परिवर्तित नहीं किया गया है। तो वहां किसी भी प्रकार का व्यवसाय जारी नहीं रखा जा सकेगा।
ट्रिब्यूनल ने जेडीए को निर्देशित किया कि अंतिम निर्णय आने तक विवादित निर्माण के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए। जांच और सुनवाई के बाद सक्षम अधिकारी निर्माण हटाने या अन्य कार्रवाई का आदेश देता है, तो संबंधित पक्ष को कार्रवाई से पहले कम से कम सात दिन का समय देना अनिवार्य होगा, ताकि वह कानूनी विकल्पों का उपयोग कर सके। ट्रिब्यूनल के आदेश में यह भी बताया है कि धारा-32 के तहत शुरू की गई कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट में लंबित लोगनाथन मामले में दिए गए निर्देशों के अनुरूप है। शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि बिना वैध अनुमति किए गए अवैध निर्माण और कृषि भूमि पर संचालित व्यावसायिक गतिविधियों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने जेडीए सहित सभी संबंधित स्थानीय निकायों को 4 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई से पहले अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि ट्रिब्यूनल का यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप वैधानिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।