काव्यांजलि
मरुभूमि की रेत पर जब
सच की प्यास दरकती थी,
शब्दों के दीप बुझते थे,
और सत्ता की धूल उड़ती
थी- तब एक स्वर उठा था
निर्भीक, वह था कर्पूर चन्द्र
कुलिशजी का अडिग संगीत।
मुट्ठीभर सपनों और
पांच सौ रुपए की लौ से
उन्होंने जलाया एक अखंड
दीप- नाम दिया उसे राजस्थान पत्रिका।
वह केवल कागज नहीं था,
वह जनमन का दर्पण था,
वह पीड़ा की पुकार थी,
अन्याय के विरुद्ध हुंकार
थी। जब सत्ता के प्रासादों में
सत्य की सांसें थमती थीं,
तब मरुस्थल की हवाओं में
पत्रिका की पंक्तियां गूंजती
थीं- "जन ही जनार्दन है,
और जनमत ही हमारा
धर्म।" कुलिशजी ने शब्दों
को शस्त्र नहीं-शक्ति बनाया
कलम को व्यापार नहीं-
जनसेवा का व्रत बनाया।
सूखे खेतों की दरारों में
उन्होंने आशा बोई, दलित,
वंचित, पीड़ितजन की चुप्पी
को आवाज दी। वे कवि भी
थे- जिनकी कविता में संघर्ष
की धूप थी, वे पत्रकार भी
थे- जिनकी दृष्टि में समाज
का रूप था। राजस्थान की
धरती ने उन्हें अपना
कुलदीपक माना, हिन्दी
पत्रकारिता ने उन्हें अपना
प्रथम पुरोहित जाना।
आज भी जब अन्याय की
आंधी चलती है, और सच की
राह कठिन होती है, मरुभूमि
के कण-कण से एक ही स्वर
उभरता है- कुलिशजी की
वह ज्योति जलती रहे,
राजस्थान पत्रिका का
संकल्प नित प्रतिदिन पलता
रहे। जब तक जन-मन में
विश्वास रहेगा, सत्य का यह
दीप अविचल रहेगा।
सज्जन राज मेहता, बेंगलुरु
कलम के तपस्वी, युग के
उजियारे, सत्य पथिक, जन-
जन के सहारे। वाणी में वेदों
का गूढ़ प्रकाश, पत्रकारिता में
सत्य का निवास। संघर्षों में
जो अडिग रहे, हर विपदा में
दृढ खड़े रहे। जनभावना के
सच्चे प्रहरी, राष्ट्रधर्म के अमिट
सिपाही। शब्दों में जिनके
शक्ति अपार, जागृत करते
जन-मन हर बार। पत्रिका को
जो स्वरूप दिया, जनमत को
सशक्त स्वर दिया। निष्पक्षता
जिनकी पहचान, सत्यनिष्ठा
उनका अभिमान। ऐसे
युगदृष्टा को शत-शत नमन,
जिनसे आलोकित हुआ यह
वतन। उनकी वाणी, उनके
विचार, रहेंगे सदा हमारे
आधार।
सत्यनारायण शर्मा, कोटा
राजस्थान की पावन धरती,
टोंक जिले के साए,
बीस मार्च उन्नीस सौ
छब्बीस, एक तेजस्वी आए।
संघर्षों की धूप में तपकर,
स्वप्नों का दीप जलाया,
'मरुधरा' की सूखी रेतों में,
सत्य का बीज उगाया।
जो कलम उठाई हाथों में,
जनता की आवाज बनी,
अन्यायों के अंधकार में,
साहस की 'परवाज' बनी।
एक दिन ये संकल्प जगा,
जनता का हो 'पत्र' सगा,
सत्ता से निर्भीक जो बोले,
सच से हो हर शब्द पगा।
इसी धारणा से ही जन्मी,
'जनचेतना' की यह धारा,
'राजस्थान पत्रिका' बनकर,
फैला जिसका उजियारा।
साधन कम, पर उच्च हौसला,
विश्वास बना आधार, छोटे से
बीज ने फिर देखा, वटवृक्ष
बना संसार। लिखी किसानों
की पीड़ा, श्रमिकों का भी दर्द
लिखा, जनता के हर आंसू
को, उन्होंने अपना हृदय
लिखा। ना झुकी कलम सत्ता
सम्मुख, ना सच से मुंह मोड़ा,
'लोकतंत्र की रक्षा' में ही,
साहस का दीपक जोड़ा।
"वेदों की गहराई" से ही,
जिनका चिंतन जुड़ा रहा,
भारतीय संस्कृति का सूरज,
उनके मन में चढ़ा रहा।
जब-जब सत्य की बात
उठेगी, जन की पीर जगेगी,
'कुलिशजी' की निर्भीक
कलम, फिर से चमक उठेगी।
'मरुधरा' के वो तेजस्वी तो,
आज भी प्रेरक बनते हैं,
पत्रकारिता के कई रस जब,
व्यावहारिकता में छनते हैं।
अनिल कुमार मिश्र, दिल्ली