काव्यांजलि
कलम हाथ में लेकर
जिन्होंने, सोया देश जगाया
था, सत्य और निर्भीकता का
जिन्होंने अलख जगाया था।
राजस्थान की माटी के वो
अनमोल सितारे थे,
'कुलिश' नाम था उनका, वे
जन-जन के सहारे थे।
वे शब्द-शिल्पी, वे युग-दृष्टा,
पत्रकारिता के थे सच्चे मार्ग दृष्टा।
न झुके कभी वो सत्ता के
आगे, न लोभ ने उन्हें घेरा था,
सच्ची और साफ हो
राजनीति, बस यही उनका
स्वप्न सवेरा था।
लोकतंत्र की नींव में जिन्होंने,
वोट का मूल्य बताया था,
हर पीड़ित की पीड़ा को,
जिम्मेदारों तक पहुंचाया था।
कलम बनी थी वज्र उनकी
और शब्द बने थे ढाल,
कुलिशजी की सोच ने ही, रचा
नया इतिहास विशाल।
सौ साल हुए उस ज्योति को,
जो आज भी प्रकाश देती है,
नई पीढ़ी को मूल्यों की,
आज भी वो सीख देती है।
आओ मिलकर शपथ लें हम,
उनके मार्ग पर चलने की,
सत्य की मशाल जलाकर,
अंधेरों से लड़ने की।
मेघा, ग्वालियर
कुलिशजी देश में ऐसा जादू
चला गए, अपने लेखन से
जन-जन के मन को भा गए।
कुलिशजी की कलम ने की
थी यही पुकार, भ्रष्टाचारी के
खिलाफ उनकी रचनाएं बनी
दीवार।
उनकी सिखाई संस्कृति
की हर रीत को, आज भी भारत
न भूला है उनकी एक-एक
सीख को। निष्पक्षता
है झलकती उनके हर विचारों में,
आज भी वह जीवित हैं
आसमान के तारों में।
हम भी मानेंगें उनकी हर एक
रीत को, आज भी भारत न
भूला है उनकी एक-एक
सीख को।
ऋषभ शर्मा, भोपाल
सामाजिक सरोकारों का
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शुभांगी शर्मा, भवानीमंडी (झालावाड़)