जयपुर

BJP और हनुमान बेनीवाल की पार्टी RLP के गठबंधन से किसे नफा, किसे नुकसान?

BJP और हनुमान बेनीवाल की पार्टी RLP के गठबंधन से किसे नफा, किसे नुकसान हाेगा।

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Apr 05, 2019

जयपुर। Lok Sabha elections 2019- राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक हनुमान बेनीवाल के भाजपा संग गठबंधन करने से प्रतीत हाेता है कि राजस्थान में छाेटे दलाें की दाल गलना बहुत मुश्किल है। कभी भाजपा में रहे 3 बड़े नेताओं (किरोड़ी लाल मीणा, घनश्याम तिवाड़ी और हनुमान बेनीवाल) ने अपनी-अपनी पार्टी का गठन किया, लेकिन उनकी दाल नहीं गल पाई। इनमें से किरोड़ी लाल मीणा को अपने दल राजपा का भाजपा में विलय करना पड़ा। कुछ ऐसा ही हाल घनश्याम तिवाड़ी का हुआ। कहा जा रहा है कि BJP चाहती थी कि बेनीवाल की पार्टी RLP का भाजपा में विलय हो, लेकिन बेनीवाल सहमत नहीं थे और सिर्फ गठबंधन पर सहमति बनी। खैर आने वाले समय में देखने को मिलेगा कि बेनीवाल इस सियासी दाव से अपनी पार्टी को संजीवनी दे पाएंगे या नहीं और इससे किसे नफा, किसे नुकसान हाेगा।

भाजपा से क्यों अलग हुई 'तिकड़ी'

किरोड़ी लाल मीणा
वसुंधरा राजे से 36 का आंकड़ा रखने वाले किरोड़ी लाल मीणा ने 2013 में राजस्थान में नई पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी (राजपा) का गठन किया। किरोड़ी ने 2013 के विधानसभा चुनाव में अपने 134 उम्मीदवार उतारे, लेकिन चुनाव में उनकी पार्टी कोई करिश्मा नहीं कर पाई और खुद किरोड़ी और उनकी पत्नी गोलमा समेत केवल 4 सीटों से ही राजपा उम्मीदवार चुनाव जीत पाए। 130 सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वे 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले 10 साल बाद भाजपा में लौट आए। किरोड़ी लाल मीणा मूल रूप से भाजपा-आरएसएस से ही ताल्लुक रखते हैं, लेकिन 2008 में उन्होंने वसुंधरा राजे से मतभेद के चलते पार्टी छोड़ी थी।


घनश्याम तिवाड़ी
पूर्व शिक्षा मंत्री और आरएसएस से लंबे समय तक जुड़े घनश्याम तिवाड़ी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से तीखे मतभेदों की वजह से भाजपा छोड़ दी थी और भारत वाहिनी पार्टी नाम से नई पार्टी खड़ी कर दी। 2018 के विधानसभा चुनाव में भारत वाहिनी पार्टी ने प्रदेश की सभी सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन पार्टी के सभी उम्मीदवार चुनाव हार गए और खुद घनश्याम तिवाड़ी की जमानत जब्त हो गई। लोकसभा चुनाव से पहले घनश्याम तिवाड़ी कांग्रेस में शामिल हो गए। छह बार विधायक और दो बार मंत्री रहे घनश्याम तिवाड़ी 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में प्रदेश में सर्वाधिक मतों से चुनाव जीते थे। उन्हें उम्मीद थी कि वसुंधरा राजे उन्हें मंत्रिमंडल में निश्चित रूप से शामिल करेंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके बाद से ही वे सरकार के खिलाफ मुखर हो गए।

हनुमान बेनीवाल
कभी वसुंधरा के धुर विरोधी रहे तेज तर्रार नेता और युवाओं के बीच लोकप्रिय हनुमान बेनीवाल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) बनाकर मैदान में डटे हुए हैं। हनुमान बेनीवाल पहली बार 2008 में भाजपा से ही विधायक रहे, लेकिन बाद में भाजपा नेताओं के खिलाफ बयानबाजी और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मतभेदों के चलते उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया था। इसके बाद बेनीवाल 2013 में निर्दलीय आैर 2018 में अपनी पार्टी आरएलपी से चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचे।

2018 के विधानसभा चुनाव में हनुमान बेनीवाल की पार्टी का प्रदर्शन भी उम्मीद के अनुसार नहीं रहा। आरएलपी ने 57 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें खुद बेनीवाल सहित तीन उम्मीदवार (खींवसर, मेड़ता व भोपालगढ़ सीट) चुनाव जीत पाए। हालांकि बेनीवाल की पार्टी ने प्रदेश की जाट बाहुल्य अन्य सीटों पर कांग्रेस-भाजपा की जीत का गणित बिगाड़ दिया था। अब 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हनुमान बेनीवाल ने भाजपा से गठबंधन किया है। बेनीवाल खुद नागौर से बतौर आरएलपी उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे। बेनीवाल जानते हैं कि अपने दम पर किसी बड़ी पार्टी से मुकाबला करना संभव नहीं है और शायद इसीलिए उन्होंने गठबंधन की राह चुनी।

भाजपा नेताओं का मानना है कि बेनीवाल के पार्टी के साथ आने का असर नागौर के अलावा जोधपुर, बाडमेर, राजसमंद, जालोर, पाली और अजमेर सीट पर भी पड़ेगा। इसके अलावा हरियाणा, वेस्ट यूपी और पंजाब में भी बेनीवाल के जरिए भाजपा जाट वोटों में सेंध लगा सकती है। वहीं बेनीवाल को भी राष्ट्रीय स्तर अपनी पार्टी को जमाने के लिए लोकसभा का चुनाव लडना जरूरी था। अब एनडीए के घटक दल के रूप में वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकेंगे।

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Updated on:
05 Apr 2019 09:46 am
Published on:
05 Apr 2019 09:00 am
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