मानसागर (जलमहल) झील का आकर्षण ही ऐसा है कि यहां पर्यटक खिंचे चले आते हैं, बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विकास के नाम पर झील को संकरा करने का काम किया जा रहा है। शहर की शान मानसागर (जलमहल) झील को विकास के नाम पर सीमित और सिकोड़ने का काम किया गया।
जयपुर. मानसागर (जलमहल) झील का आकर्षण ही ऐसा है कि यहां पर्यटक खिंचे चले आते हैं, बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विकास के नाम पर झील को संकरा करने का काम किया जा रहा है। शहर की शान मानसागर (जलमहल) झील को विकास के नाम पर सीमित और सिकोड़ने का काम किया गया। कहीं मिट्टी भरी गई तो कहीं लाल पत्थर लगाकर बहाव क्षेत्र को कम कर दिया गया। किया जा रहा है।
पिछले ढाई दशक में झील के साथ सरकार से लेकर जिम्मेदार विभागों ने मनमानी की। तभी तो जिस बांध की भराव क्षमता 16 फीट गहरी थी, उसे कागजों में 12 फीट किया गया, जबकि, मौके पर 8 फीट भी नहीं है। भराव क्षमता कम करने के पीछे जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि शहरी और औद्योगिक क्षेत्र बढऩे से अत्यधिक पानी की जरूरत नहीं है।
मानसून के दौरान होता बुरा हाल
मानसून में झील लबालब हो जाती है। ऐसे में झील से पानी ओवरफ्लो होकर दिल्ली रोड पर पहुंच जाता है। इसके साथ ही आमेर जाने वाला रास्ते पर भी आवाजाही रुक जाती है। दिल्ली रोड स्थित जयसिंहपुरा खोर में कई कॉलोनियां तालाब बन जाती हैं और लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो जाता है।
कैसे सिमटती गई झील
-वर्ष 2000 से 2010 के बीच सौंदर्यीकरण और विकास परियोजनाओं के नाम पर झील के किनारों को संकरा किया गया।
-तीन ओर सड़कों का निर्माण हुआ, जिससे प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र को जानबूझकर कम किया गया।
-झील के भराव क्षेत्र में लाल पत्थर और पक्के निर्माण किए गए।
-वर्षों से गाद और मिट्टी की सफाई नहीं होने से जलधारण क्षमता और घट गई।
संरक्षण का इतिहास और पत्रिका की मुहिम
वर्ष 2004 में तत्कालीन सरकार ने 160 बीघा जमीन निजी फर्म को सौंप दी थी। इसके विरोध में राजस्थान पत्रिका ने झील बनी तलैया अभियान चलाया। वर्ष 2012 में हाईकोर्ट ने आवंटन निरस्त किया। वर्ष 2015 में राज्य सरकार ने 382.24 एकड़ क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया। संरक्षित क्षेत्र में नए निर्माण पर रोक है और पूर्व निर्माण का व्यावसायिक उपयोग भी प्रतिबंधित किया गया।
टॉपिक एक्सपर्ट
पहले झील का फैलाव बहुत बड़ा था। तेज बारिश के दौरान झील का पानी मौजूदा आमेर रोड पार करके परशुरामद्वारा तक आ जाता था। ये झील के व्यापक फैलाव का प्रमाण था। इतना ही नहीं, इस क्षेत्र में कई दिन तक जमा रहता था। मानसून के दौरान इसके गेट भी खोले गए हैं। विकास के नाम पर पूर्व में भराव क्षमता को कम कर दिया गया। इससे अब थोड़ी बारिश में ही झील भर जाती है और पानी दिल्ली रोड पर निकलना शुरू हो जाता है। कंक्रीट और अनावश्यक पक्के निर्माण हटाकर वेटलैंड जोन विकसित किए जाएं। साथ ही जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी होनी चाहिए।
-सियाशरण लश्करी, संस्थापक अध्यक्ष, जयपुर फाउंडेशन
जिम्मेदार ऐसा क्यों करते रहे?
-राजस्व और पर्यटन का दबाव: झील को पर्यटन हब बनाने की होड़ में पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी।
-योजनाबद्ध मास्टर प्लान की कमी: जलग्रहण क्षेत्र और प्राकृतिक जलप्रवाह को ध्यान में रखकर समग्र योजना नहीं बनी।
-विभागों में समन्वय का अभाव: जेडीए, नगर निगम, जल संसाधन विभाग और पर्यटन विभाग के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी तय नहीं हुई।
-सौंदर्यीकरण बनाम पारिस्थितिकी: कंक्रीट और पत्थर को विकास का प्रतीक मान लिया गया, जबकि झील को सांस लेने की जगह चाहिए थी।