जयपुर

Rajasthan Assembly Election 2018: मिलिए, राजस्थान के आयाराम-गयाराम नेताओं से

चुनावों के मौक़े पर राजनीति में रातों-रात पाला बदलने वाले आया-गयाराम सक्रिय हो गए हैं।

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Oct 17, 2018

विशाल'सूर्यकांत'/जयपुर। चुनावों के मौक़े पर राजनीति में रातों-रात पाला बदलने वाले आया-गयाराम सक्रिय हो गए हैं। ऐसे नेता दरअसल,राजनीति के वो कुशल'मौसम विज्ञानी'होते हैं जिन्हें आती हवाओं का अहसास होने लगता है या फिर मौजूदा हवाओं का रूख़ बदलना होता है।

राजस्थान की राजनीति में ऐसे नेताओं की राजनीतिक पारी आप इस खबर में पढ़ेंगे। लेकिन चूंकि आप इस खबर से जुड़े हैं तो खास आपके लिए ये दिलचस्प जानकारी हम लेकर आए हैं कि आयाराम-गयाराम कोई राजनीतिक जुमला या काल्पनिक उपमा नहीं बल्कि हकीकत की घटना से निकली मिसाल है। ये किस्सा हरियाणे का है। 1967 में एक विधायक थे, जिनका नाम था गयाराम। हरियाणा के हसनपुर क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए 1967 में गयाराम विधायक बन गए।

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लेकिन एक ही दिन में तीन बार राजनीतिक दल और दिल दोनों इस फुर्ती के साथ बदले कि उनका नाम दल-बदलूओं के लिए नजीर बन गया। ये वाकया हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा की सरकार गिरने के वक्त का है। कांग्रेस से टूट कर आए विधायकों ने विशाल हरियाणा पार्टी बना ली और बिरेन्द्र सिंह की अगुवाई में नई सरकार बना ली। इसी दौरान फरीदाबाद जिले की हसनपुर सीट के निर्दलीय विधायक गयालाल ने आनन-फानन में 24 घंटों में ही तीन पार्टियां बदल डाली।

ये हरियाणा की राजनीति का वो दौर था। जब सुबह,दोपहर,शाम और रात तक विधायक चार पार्टियां बदल रहे थे। इसी के बाद से दलबदलूओं की सियासत के प्रतीक बनकर उभरा गयाराम का नाम। गयाराम जी की राजनीतिक शैली इतनी चर्चित रही कि बकायदा राजनीतिक विज्ञान के स्टूडेंट्स को उनकी दास्तान सुनाई जाती है।


है न दिलचस्प किस्सा..! ख़ैर,बात हो रही थी राजस्थान के आयाराम-गयाराम शैली के नेताओं की। मानवेन्द्र सिंह ने चुनावों से ऐनवक्त पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया,उधर भाजपा के प्रमुख नेता रहे और राजस्थान किसान महापंचायत के कर्ता-धर्ता रहे रामपाल जाट ने भी आखिरकार आम आदमी पार्टी से खुद को जोड़ लिया।

राजस्थान की राजनीति में आयाराम-गयाराम संस्कृति की रहनुमाई करने वाले नेताओं की कमी नहीं। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद में कई ऐसे उदाहरण है जो राजस्थान में आयाराम-गयाराम संस्कृति में अपनी राजनीतिक पारी संवारते रहे हैं। इस कड़ी में पहले नेता हैं भरतपुर के पूर्व महाराज और डीग-कुम्हेर विधायक विश्वेन्द्र सिंह।

विश्वेन्द्र सिंह
भरतपुर के पूर्व महाराजा और डीग-कुम्हेर से विधायक विश्वेन्द्र सिंह का दिल और दल अक्सर बदलता रहता है। वो किसी भी पार्टी में रहें लेकिन भरतपुर की सियासत उनके मुताबिक ही चलती है। वो कांग्रेस में रहें या बीजेपी में, पार्टी में रहकर भी अलहदा रूख चर्चाओं में रहता है।

न सिर्फ विश्वेन्द्र सिंह बल्कि उनकी पत्नी दिव्या सिंह का रूख़ भी पति की राहों के मुताबिक बदलता रहता है। अभी की ही बात लीजिए विश्वेन्द्र सिंह कांग्रेस में हैं लेकिन पार्टी अध्यक्ष सचिन पायलट से खफा है। पार्टी आलाकमान तक को कह चुके हैं कि जैसे पंजाब में किया, राजस्थान में अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री घोषित करो नहीं तो पार्टी छोड़ दूंगा।

विश्वेन्द्र सिंह का दिल इस कदर बदलता रहा है कि आज गहलोत की पैरोकारी कर रहे हैं तो कल वसुन्धरा राजे के राजनीतिक सलाहकार की भूमिका में थे। उनकी पत्नी दिव्या सिंह अधीनस्थ कर्मचारी सेवा बोर्ड की अध्यक्ष बनी थी। फिलहाल विश्वेन्द्र सिंह, कांग्रेस के साथ बने हुए हैं लेकिन आए दिन पार्टी बदलने की सुगबुगाहट चलती रहती है।

कर्नल सोनाराम
आयाराम-गयाराम संस्कृति की नजीर आपको कर्नल सोनाराम की सियासत में मिलेगी। कर्नल सोनाराम,कांग्रेस के विधायक थे और रातों-रात बीजेपी ने पूर्व विदेश मंत्री और मानवेन्द्र सिंह के पिता जसवंत सिंह जसोल का टिकट काटकर एक दिन पहले पार्टी में आए कर्नल सोनाराम को टिकट दे दिया।

कर्नल सोनाराम बीजेपी में आकर सांसद का चुनाव भी जीत गए। सूत्र बता रहे हैं कि अब हनुमान बेनिवाल की गतिविधियों पर टिप्पणियों में व्यस्त हैं। फिलहाल तो बीजेपी के साथ बने हुए हैं कर्नल सोनाराम।

गोविन्द मेघवाल
बीकानेर की राजनीति में जनता दल, बीजेपी और कांग्रेस तीनों पार्टियों में गलियारे नाप चुके गोविंद मेघवाल की सियासत का अनोखा अंदाज है। नोखा से विधायक रहे गोविन्द मेघवाल, वसुन्धरा राजे की पहली सरकार में संसदीय सचिव रहे।

परिसीमन के बाद खाजूवाला सीट से निर्दलीय चुनाव लडे और 2013 में कांग्रेस में शामिल होकर खाजूवाला विधानसभा सीट के प्रत्याशी बनें। उनके कांग्रेस में आते ही नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी से तनातनी की खबरें रहती हैं। नोखा और खाजूवाला की राजनीति में दोनों की तकरार के किस्से जगजाहिर हैं।

नवीन पिलानियां
बीजेपी के पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ.ज्ञानप्रकाश पिलानिया के पुत्र नवीन पिलानिया, फिलहाल आमेर से विधायक हैं। नवीन पिलानियां,पिछली बार बीजेपी से टिकट नहीं मिलने पर डॉ.किरोड़ीलाल मीणा के साथ राजपा में शामिल हुए। 2003 में आमेर-झोटवाड़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा।

परिसीमन के बाद 2008 में आमेर और झोटवाड़ा दो अलग विधानसभा बनी। 2013 में राजपा के टिकट से चुनाव लड़ा और विधायक बन गए। अब स्थिति ये है कि राजपा,राजस्थान के कर्ता-धर्ता डॉ.किरोडीलाल मीणा तो अपनी मूल पार्टी भाजपा में लौट आए मगर वो अभी राजपा में टिके हुए हैं। कभी कांग्रेस से नजदीकियां रहती हैं तो आजकल उनके कार्यकर्ता बताते हैं कि वो बसपा से टिकट के तलबगार हैं। हालांकि अभी उन्होंने निर्णय नहीं लिया है।

रणधीर सिंह भींडर
रणधीर सिंह भींडर उदयपुर संभाग के कद्दावर नेताओं मे से एक हैं। उदयपुर संभाग में वल्लभनगर सीट से निर्दलीय विधायक रणधीर सिंह ने अपनी जनता सेना बना रखी है। निर्दलीय विधायक बनने के बाद जनता सेना के बैनर तले उनके उम्मीदवारों ने पंचायत से लेकर पालिका तक जनता सेना का परचम लहराया है लेकिन उनकी पत्नी दीपेन्द्र कुंवर भाजपा महिला मोर्चा की पदाधिकारी रही हैं।

अभी गौरव यात्रा में वसुन्धरा राजे, भींडर गई तो बीजेपी के बजाए जनता सेना का मंच था, जहां रणधीर सिंह भींडर और वसुन्धरा राजे के ही पोस्टर थे। मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के भाषण में कहा गया कि रणधीर को जीताओ, ताकि मुझे मजबूती मिले। जबकि मेवाड़ के कई भाजपा नेताओं के साथ रणधीर सिंह भींडर का राजनीति में छत्तीस का आंकड़ा है।

डॉ.हरिसिंह
पूर्व मंत्री एवं सांसद डॉ.हरि सिंह का कांग्रेस में खासा दबदबा था। पेशे से डॉक्टर रहे हरिसिंह,अपने ही चेले डॉ.चन्द्रभान के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षीय कार्यकाल में कांग्रेस छोड़नी पड़ी। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के धूर विरोधी रहे डॉ.हरिसिंह को उस वक्त उनके समधी डॉ.दिगम्बर सिंह भारतीय जनता पार्टी में ले आए।

उस वक्त जयपुर के किसान छात्रावास में बकायदा कार्यक्रम हुआ, मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे खुद आई,हरिसिंह का स्वागत किया। लेकिन डॉ.दिगम्बर सिंह के निधन के बाद भाजपा में उनकी पूछ-परख खत्म हो गई और सचिन पायलट के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद एक बार फिर डॉ.हरिसिंह की घरवापसी हुई। अब वो फुलेरा से फिर ताल ठोकने को तैयार हैं।

डॉ.राजकुमार शर्मा
मूल रूप से कांग्रेसी संस्कारों में रचे-बसे पूर्व चिकित्सा राज्यमंत्री डॉ.राजकुमार शर्मा 2008 में टिकट काटा गया तो बहुजन समाजवादी पार्टी का टिकट ले आए और नवलगढ़ से चुनावी मैदान में उतर गए। बसपा की टिकट पर चुनाव जीता तो अपने साथ पांच बसपा विधायक साथियों को लामबंद किया और पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत की अल्पमत सरकार को पूरे पांच साल चलाने के लिए आगे आ गए।

उस वक्त बसपा विधायक दल का ही कांग्रेस में विलय करवा लिया। मामला दल-बदल कानून के तहत अदालती कार्यवाही और विधानसभा के बीच चलता रहा। इधर, गहलोत सरकार के पांच साल का कार्यकाल पूरा करवा कर बसपा से आए विधायक कांग्रेस के तारणहार बन गए थे।

राजेन्द्र गुढ़ा
राजेन्द्र गुढ़ा की राजनीति पारी की शुरुआत छोटे भाई रणवीर गुढ़ा की राजनीति को बढ़ाते हुए हुई। रणवीर गुढ़ा के साथ सामाजिक न्याय मंच से जुड़े राजेन्द्र गुढ़ा खुद राजनीति में तब आए जब रणवीर गुढ़ा आपराधिक मामले में जेल में जाने की वजह से राजनीतिक परिदृश्य से नेपथ्य में चला गया।

इससे पहले रणवीर गुढ़ा को रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा से चुनाव लड़वाया। इसके बाद राजेन्द्र गुढ़ा,बहुजन समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ा और उदयपुरवाटी से चुनाव जीते और बसपा के छह विधायकों के साथ कांग्रेस में आकर गहलोत सरकार में मंत्री बन गए।

इसके बाद कांग्रेस की टिकट से चुनाव लड़ा मगर पराजित हुए। अब चुनावी माहौल में एक बार फिर सक्रिय हुए हैं लेकिन पार्टी कौनसी होगी, ये अभी तय नहीं,क्योंकि टिकट का ऐलान नहीं हुआ है।

परसादीलाल मीणा
लालसोट के पूर्व निर्दलीय विधायक और गहलोत सरकार के मंत्री परसादीलाल मीणा 2008 में कांग्रेस टिकट के दावेदार थे। 2008 में टिकट कटी तो निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतरे और सीट निकाल लाए।

कांग्रेस की अल्पमत सरकार को समर्थन देने के बाद, परसादीलाल की कांग्रेस में फिर घर-वापसी हो गई। गहलोत सरकार के वक्त कांग्रेस में एक वक्त ऐसा था जब परसादी और उनके धूर विरोधी डॉ.किरोडीलाल मीणा दोनों का एक साथ कांग्रेस से जुड़ाव था।

डॉ.किरोडीलाल मीणा-गोलमा देवी
राजस्थान की राजनीति में किसी भी पार्टी में रहें लेकिन अपना और अपने समर्थक नेताओं का वजूद बचाए रखना डॉ.किरोडीलाल मीणा का खास सियासी हुनर है। पूर्वी राजस्थान की राजनीति एक दौर में डॉ.किरोडीलाल मीणा के इर्द-गिर्द घुम रहती रही है।

चाहे वो बीजेपी में हों, कांग्रेस में हो या फिर राजपा में, पार्टी का फर्क नहीं पड़ता,उनकी अपनी फॉलोविंग है। एक वक्त में निर्दलीय सांसद के रूप में यूपीए सरकार के साथ रहे। उनकी पत्नी गोलमा देवी गहलोत सरकार में खादी मंत्री रही। लेकिन फिर संगमा की पार्टी राजपा का दामन थामा। अब एक बार फिर डॉ.किरोड़ीलाल मीणा ने भाजपा में घर-वापसी कर ली और पार्टी की कोर लीडरशिप में शामिल हो चुके हैं।

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Updated on:
17 Oct 2018 09:47 pm
Published on:
17 Oct 2018 09:41 pm
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