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भारत की क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन की रेस में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने राजस्थान के नीति निर्माताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सालों से अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में निर्विवाद राजा रहा राजस्थान अब दूसरे पायदान पर खिसक गया है। केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा जारी 31 मार्च 2026 तक के ताजा आंकड़ों ने स्पष्ट कर दिया है कि पड़ोसी राज्य गुजरात ने राजस्थान को बेहद मामूली अंतर से पीछे छोड़ दिया है।
गुजरात और राजस्थान के बीच की यह जंग अब 21वीं सदी की 'एनर्जी वॉर' में तब्दील हो गई है।
भले ही कुल क्षमता में गुजरात आगे निकल गया हो, लेकिन सूरज की रोशनी के मामले में राजस्थान का कोई सानी नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गुजरात की जीत के पीछे उसकी 'मल्टी-मॉडल' रणनीति है।
गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (GUVNL) की एमडी शालिनी अग्रवाल के अनुसार, मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों के कारण ऊर्जा संकट गहराया है, लेकिन अक्षय ऊर्जा ने राज्यों को 'लचीलापन' दिया है। राजस्थान के लिए सबक यह है कि केवल सौर ऊर्जा पर निर्भर रहने के बजाय उसे विंड, हाइड्रो और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) में भी तेजी से निवेश करना होगा।
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट (GW) का लक्ष्य रखा है। गुजरात ने अपना लक्ष्य 100 गीगावाट तय किया है और वह अपनी आधी यात्रा (47 GW) पूरी कर चुका है। राजस्थान के पास भी विशाल रेगिस्तानी जमीन है, लेकिन गुजरात के पास निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर की जो गति है, उसने राजस्थान के लिए 'खतरे की घंटी' बजा दी है।
अक्षय ऊर्जा की यह रेस अभी खत्म नहीं हुई है। राजस्थान के पास आने वाले महीनों में कई मेगा सोलर पार्क चालू होने वाले हैं। क्या राजस्थान अपनी विशाल परियोजनाओं के दम पर अगले तिमाही आंकड़ों में गुजरात को फिर से पीछे छोड़ पाएगा? या फिर गुजरात का 'विंड और सोलर' का कॉम्बो उसे स्थायी रूप से नंबर 1 बनाए रखेगा? आने वाला समय बताएगा कि 'म्हारो राजस्थान' अपनी खोई हुई चमक कैसे वापस पाता है।
Updated on:
06 May 2026 02:39 pm
Published on:
06 May 2026 02:13 pm
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