भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित सुंदरा गाँव, जो दशकों से पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा था, अब 'नर्मदा के नीर' से सराबोर हो गया है। 728 किलोमीटर का सफर तय कर जब माँ नर्मदा का पानी इस सरहदी गाँव पहुँचा, तो वर्षों का सूखा और संघर्ष एक झटके में खत्म हो गया।
थार के रेगिस्तान की तपती रेत और अंतरराष्ट्रीय सीमा की चुनौतियों के बीच बसे सुंदरा गाँव ने आज एक नया इतिहास रचा है। आज़ादी के 78 साल बाद, इस गाँव के हर घर तक पहली बार नल से स्वच्छ और मीठा पेयजल पहुँचा है। यह सफलता केवल एक इंजीनियरिंग उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों की जीत है जिन्होंने पीढ़ियों से खारा पानी पीकर अपना जीवन काटा है।
सुंदरा गाँव का इतिहास बहुत पुराना है। 1734 में स्थापित यह गाँव कभी क्षेत्रफल के लिहाज से देश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत हुआ करता था (1345 वर्ग किमी)। लेकिन इतनी बड़ी पहचान के बावजूद, यहाँ की सबसे बड़ी समस्या पीने का पानी थी।
यहाँ का ज़मीनी पानी इतना खारा था कि वह पीने लायक नहीं था। सरकारी ट्यूबवेल भी इस समस्या का समाधान नहीं कर पाए। ग्रामीणों को पानी के लिए 15 से 20 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था।
सीमा पर स्थित होने के कारण सुंदरा गाँव ने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की विभीषिका झेली है। युद्ध के समय ग्रामीणों को गाँव खाली करना पड़ा था। इन ऐतिहासिक चुनौतियों के बीच, पानी की कमी ने यहाँ के जनजीवन को हमेशा 'अस्थिर' बनाए रखा।
सरदार सरोवर बांध (गुजरात) से शुरू होकर नर्मदा का पानी राजस्थान के रेतीले टीलों को चीरते हुए 728 किलोमीटर दूर सुंदरा पहुँचा है।
दशकों से खारा पानी पीने के कारण सुंदरा के लोगों में समय से पहले बुढ़ापा, कमजोर हड्डियां और दांतों का पीलापन जैसी बीमारियां घर कर गई थीं।
गाँव की महिलाओं के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है। अब उन्हें मीलों दूर मटके लेकर नहीं जाना पड़ता। 80-90 साल की बुजुर्ग महिलाओं ने जब पहली बार घर के आंगन में मीठे पानी का नल देखा, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
सुंदरा अब केवल एक 'प्यास' बुझने की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश के अंतिम छोर तक विकास पहुँचने का प्रतीक है। मीठे पानी की उपलब्धता से अब यहाँ पशुपालन और कृषि की नई संभावनाएं भी तलाश की जा सकेंगी, जिससे सीमावर्ती इलाकों से होने वाले पलायन पर भी रोक लगेगी।