
राजस्थान में आयोजित हुई वर्ष 2026 की तृतीय राष्ट्रीय लोक अदालत न केवल कानूनी विवादों के निस्तारण का एक बड़ा माध्यम बनी, बल्कि इसने कई उजड़ते हुए घरों और परिवारों को टूटने से भी बचा लिया। पारिवारिक न्यायालयों में जज और अधिवक्ताओं की समझाइश से वर्षों पुराने दांपत्य रिश्तों की दरारें भर गईं, और जो पति-पत्नी अदालत में अलग होने के लिए पहुंचे थे, वे आपसी गिले-शिकवे भुलाकर अपने बच्चों के साथ एक नई शुरुआत करने के लिए खुशी-खुशी अपने घर लौटे। इस मानवीय पहल ने पूरे प्रदेश में एक सकारात्मक संदेश दिया है।
पारिवारिक न्यायालय क्रम संख्या 2 के न्यायाधीश विशाल भार्गव के विशेष प्रयासों से एक 13 साल पुराने दांपत्य रिश्ते में सफलतापूर्वक सुलह कराई गई। दोनों पक्ष अलग-अलग कानूनी कार्रवाई के लिए अदालत पहुंचे थे, लेकिन प्री-कॉउंसलिंग और गहन समझाइश के बाद उनके बीच के सारे मनमुटाव दूर हो गए।
एक अन्य मामले में भी करीब एक साल से अलग रह रहे दंपती के 7 साल पुराने विवाह को टूटने से बचा लिया गया। समझाइश की यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों दंपतियों को पारिवारिक न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डी.एस. शेखावत और अन्य वकीलों की मौजूदगी में फूलों की माला पहनाई गई और मुंह मीठा करवाकर विदा किया गया। अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए एक साथ लौट रहे इन परिवारों के चेहरों पर खुशी साफ झलक रही थी।
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय लोक अदालत में आमजन को त्वरित और सुलभ न्याय देने के अनूठे उदाहरण देखने को मिले। प्रदेशभर में कुल 67,20,971 प्रकरणों का आपसी सहमति से निस्तारण किया गया। इनमें विभिन्न न्यायालयों में लंबित 8,60,986 प्रकरणों का निपटारा किया गया, जिसके तहत कुल 2,576 करोड़ रुपए से अधिक की राशि के अवॉर्ड पारित किए गए।
राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के मुख्य संरक्षक न्यायाधिपति संजय के. अग्रवाल ने इस अवसर पर कहा कि लोक अदालत केवल मुकदमों को खत्म करने का जरिया नहीं है, बल्कि यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक संवेदनशील न्याय पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों, अधिवक्ताओं और विधि विद्यार्थियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को राहत और संतोष प्रदान करना है।