
जयपुर. नीट-यूजी में पात्रता हासिल करने के बावजूद विद्यार्थियों को एमबीबीएस की सीट मिलना तय नहीं है। राजस्थान में तीसरे चरण की काउंसलिंग के बाद यह स्थिति सामने आई है। राज्य के सरकारी और राजस्थान मेडिकल एजुकेशन सोसायटी (राजमेस) के मेडिकल कॉलेजों में सभी सीटें भर चुकी हैं, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में अब भी 1200 से अधिक सीटें खाली हैं। डेंटल कॉलेजों में भी कई सीटें रिक्त पड़ी हैं। खास बात यह है कि इसी साल निजी मेडिकल कॉलेजों में करीब 1100 नई सीटें जोड़ी गई थीं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में सीटें खाली रहना चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था के सामने सवाल खड़े कर रहा है। इन सीटों के खाली रहने के पीछे निजी कॉलेजों की भारी फीस, प्रवेश से जुड़े सख्त नियम और न्यायालय के निर्देशों को प्रमुख कारण माना जा रहा है।'
अभिभावक और चिकित्सा शिक्षा मामलों के जानकार डॉ. राजेन्द्र कुमार शर्मा का कहना है कि निजी मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़ी सीटों को भरने के लिए प्रवेश की योग्यता के मानकों में कमी करने के बजाय फीस निर्धारण की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उनका मानना है कि यदि निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस विद्यार्थियों और उनके परिवारों की आर्थिक क्षमता के अनुरूप रखी जाए, तो अधिक योग्य विद्यार्थी इन कॉलेजों में प्रवेश लेने के लिए आगे आ सकते हैं। इससे विद्यार्थियों को चिकित्सा शिक्षा हासिल करने के अधिक अवसर मिलेंगे और उनके लिए एमबीबीएस की पढ़ाई के विकल्प भी बढ़ेंगे। साथ ही, निजी मेडिकल कॉलेजों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की समस्या को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
निजी कॉलेजों में सालाना फीस करीब 25 लाख और राजमेस कॉलेजों में 10 लाख रुपए है। चार-पांच वर्ष की पढ़ाई और अन्य खर्चों को जोड़ने पर परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है।
न्यूनतम अंक हासिल करने से विद्यार्थी काउंसलिंग में भाग लेने के लिए पात्र हो सकता है, लेकिन वास्तविक प्रवेश उपलब्ध सीटों, नियमों, श्रेणी, विकल्पों और संबंधित दौर की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। निजी कॉलेजों में खाली सीटों के पीछे प्रवेश नियम और न्यायालय के निर्देशों का सख्ती से पालन एक प्रमुख कारण है।
- डॉ. बी.एल. कुमावत, अध्यक्ष, नीट-यूजी काउंसलिंग बोर्ड