Rajasthan Domicile Rules: राजस्थान में मूल निवास प्रमाण-पत्र जारी करने को लेकर गृह विभाग ने नई गाइडलाइन जारी की है, जिसमें प्रमाण पत्र जारी करने के लिए कलक्टर, उपखंड अधिकारी (एसडीएम), सहायक कलक्टर और तहसीलदारों को अधिकृत किया है।
Rajasthan Domicile Rules: राजस्थान में मूल निवास प्रमाण-पत्र जारी करने को लेकर गृह विभाग ने नई गाइडलाइन जारी की है, जिसमें प्रमाण पत्र जारी करने के लिए कलक्टर, उपखंड अधिकारी (एसडीएम), सहायक कलक्टर और तहसीलदारों को अधिकृत किया है। विभाग ने आदेश जारी कर प्रमाण-पत्र बनाने की प्रक्रिया स्पष्ट की है।
गृह विभाग के अनुसार सरकार ने व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है, बल्कि वर्ष 2012 में जारी आदेशों और प्रावधानों को ही दोहराया गया है। हालांकि इसमें आइटी से संबंधित प्रावधानों को भी जोड़ा गया है।
नई गाइडलाइन के अनुसार अब वे लोग भी मूल निवास प्रमाण-पत्र बनवा सकेंगे, जो राजस्थान में 10 वर्ष या अधिक समय से किराए के मकान में रह रहे हैं। इसके लिए उन्हें 10 वर्षों के किरायानामे और पहचान दस्तावेज देने होंगे। वहीं जिनके माता-पिता राजस्थान सरकार या सरकारी उपक्रमों में तीन वर्ष से कार्यरत हैं, वे स्वयं और उनके बच्चे भी मूल निवास के पात्र होंगे।
गृह विभाग ने प्रमाण-पत्र जारी करने से पहले आवेदक से शपथ-पत्र लेने के साथ दो जिम्मेदार व्यक्तियों की अनुशंसा भी अनिवार्य की है। इसके अंतर्गत सांसद, विधायक, गजेटेड अधिकारी, जिला प्रमुख, सरपंच, पटवारी, पार्षद, सरकारी कर्मचारी अथवा पुलिस बीट प्रभारी सहित विभिन्न जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों में से किन्हीं दो के प्रमाण-पत्र आवेदन के साथ लगाने होंगे।
गाइडलाइन में स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता राजस्थान के मूल निवासी हैं तो आवेदक को जन्म प्रमाण-पत्र और माता-पिता का मूल निवास प्रमाण-पत्र देना होगा। वहीं राजस्थान के मूल निवासी से विवाह करने वाली दूसरे राज्यों की महिलाओं को विवाह प्रमाण-पत्र, पति का मूल निवास और पहचान पत्र देना होगा। साथ ही पीहर के मूल निवास को सरेंडर करने का शपथ-पत्र भी आवश्यक होगा।
हालांकि गाइडलाइन में महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों पर अब भी स्पष्टता नहीं है। विधवा, तलाकशुदा और न्यायालय में विचाराधीन वैवाहिक मामलों वाली महिलाओं के मूल निवास किस आधार पर जारी किए जाएंगे, इसे लेकर कोई विस्तृत दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए हैं। प्रशासनिक और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं की बदलती सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार को अलग और स्पष्ट प्रावधान तय करने चाहिए थे।