Patrika Foundation Day: जयपुर एक सुनियोजित शहर के रूप में जाना जाता है। परकोटा इसकी मिसाल है। जयपुर के बाहरी क्षेत्रों में भी इसी के अनुरूप विकास हो रहा है। पर कई इलाके अनदेखी के भेंट चढ़ गए हैं। इन क्षेत्रों में अनियोजित विकास होने से लोगों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं हैं। अब एक सवाल है कि वर्ष 2030 का जयपुर कैसा हो, पढ़ें यह ग्राउंड रिपोर्ट।
Patrika Foundation Day: जयपुर एक सुनियोजित शहर के रूप में जाना जाता है। परकोटा इसकी मिसाल है। जयपुर के बाहरी क्षेत्रों में भी इसी के अनुरूप विकास हो रहा है। पर कई इलाके अनदेखी के भेंट चढ़ गए हैं। इन क्षेत्रों में अनियोजित विकास होने से लोगों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं हैं। अब एक सवाल है कि वर्ष 2030 का जयपुर कैसा हो, पढ़ें यह ग्राउंड रिपोर्ट।
तेजी से फैलता शहर, बदलती जीवनशैली के बीच गुलाबी नगर जयपुर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर ऐतिहासिक परकोटा और पारंपरिक बस्तियां हैं, तो दूसरी ओर नई कॉलोनियां और ऊंची इमारतों का विस्तार। लेकिन विकास की इस दौड़ में शहरी नियोजन कई जगह पीछे छूटता नजर आता है। अवैध कॉलोनियां, संकरी सड़कें, फुटपाथ से लेकर सड़कों पर अतिक्रमण और असंतुलित भूमि उपयोग शहर की चुनौतियां बन चुके हैं।
वर्ष 2030 को लक्ष्य मानते हुए अब जरूरत है कि जो नया मास्टर प्लान बने, उसको सख्ती से लागू किया जाए ताकि जयपुर को अनियोजित विस्तार से निकालकर व्यवस्थित, सुरक्षित और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ाया जाए। साफ सड़कें, हरित क्षेत्र और सुरक्षित यातायात ही आधुनिक जयपुर की पहचान बनें। अवैध निर्माण पर रोक और संतुलित भूमि उपयोग से ही शहर सांस ले पाएगा। परंपरा व आधुनिकता का संतुलन ही शहर को विशिष्ट बनाए रखेगा।
सुरक्षा और ऊर्जा दोनों की बचत जयपुर में लगभग दो लाख स्ट्रीट लाइट पॉइंट्स हैं। इनमें से ज्यादातर एलईडी हैं। ऊर्जा बचत पर निगम का फोकस है, इसको और बेहतर करने की जरूरत है। एलईडी लाइट से ऊर्जा खपत में 35 से 40 प्रतिशत तक कमी आती है। स्मार्ट कंट्रोल सिस्टम के जरिए लाइट की निगरानी रिमोट से होगी और खराबी की सूचना तुरंत मिलेगी। इससे मेंटिनेंस लागत भी घटेगी। साथ ही बेहतर रोशनी से रात्रिकालीन सुरक्षा मजबूत होगी। यह पहल ऊर्जा दक्षता, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक सुरक्षा-तीनों लक्ष्यों को एक साथ साधेगी। 2030 का जयपुर स्मार्ट, सुरक्षित व सुव्यवस्थित रोशनी वाला शहर बनेगा। ऊर्जा बचत के साथ पर्यावरण भी मुस्कराएगा।
ये हैं जरूरतें
80000 से अधिक नई स्ट्रीट लाइटों की जरूरत पड़ेगी निगम का दायरा बढ़ने से।
02 लाख से अधिक स्ट्रीट लाइटें लगाई जा चुकी हैं राजधानी में निगम की ओर से।
राजधानी में बड़ी संख्या में अवैध कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं। इनमें सड़क, नाली, पेयजल और पार्क जैसी सुविधाओं का अभाव है। वर्तमान में कई कॉलोनियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन आधारभूत ढांचे का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है। 2030 के विजन में यह आवश्यक है कि इन कॉलोनियों को केवल कागजी वैधता न दी जाए, बल्कि समुचित इंफास्ट्रक्चर के साथ पुनर्विकसित किया जाए। नियमित कॉलोनी और अवैध कॉलोनी की तुलना स्पष्ट करती है कि नियोजित विकास में सड़क चौड़ी, पार्क सुव्यवस्थित और स्ट्रीट लाइट बेहतर होती है, जबकि अनियोजित बस्तियों में मूलभूत सुविधाएं भी संघर्ष का विषय हैं।
जेडीए एक्शन-
1100 से अधिक अवैध कॉलोनियों को ध्वस्त किया है जेडीए ने पिछले तीन वर्ष में।
170 से अधिक अवैध इमारतों को सील किया है जेडीए की प्रवर्तन शाखा ने तीन वर्ष में।
आधुनिक शहरी नियोजन में ट्रांजिट ओरिएंटेड डवलपमेंट को महत्वपूर्ण माना जाता है। जयपुर मैट्रो के कॉरिडोर के आस-पास उच्च घनत्व और मिश्रित भूमि उपयोग का विकास कर आवास, कार्यालय और वाणिज्यिक गतिविधियों को सार्वजनिक परिवहन से जोड़ा जा सकता है। इसके लिए जेडीए ने प्रयास भी किए हैं। मेट्रो फेज-2 के प्रस्तावित रूट में पांच प्रमुख मार्ग को विकसित करने का प्रावधान भी किया है। यहां हाईराइज बिल्डिंग बनाने के लिए जेडीए ने छूट का प्रावधान किया है। मिश्रित उपयोग से लेकर व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकेगा और मेट्रो ट्रेन को यात्री भार भी सामान्य की तुलना में अधिक मिल सकेगा।
ये फायदा होगा -
यदि 2030 तक मेट्रो का विस्तार व उसके आस-पास नियोजित विकास हो तो निजी वाहनों पर निर्भरता कम होगी और ट्रैफिक दबाव घटेगा। वॉकिंग डिस्टेंस पर सार्वजनिक परिवहन मिलेगा।
जयपुर में कई स्थानों पर फुटपाथ बने हैं, लेकिन अतिक्रमण और डिजाइन की खामियों के कारण उनका उपयोग सीमित है। पैदल यात्री और दिव्यांग अक्सर असुविधा का सामना करते हैं। फुटपाथ न होने की वजह से लोग हादसों का शिकार हो रहे हैं। राजधानी की बात करें तो महज 50 फीसदी सड़कों पर ही फुटपाथ हैं। इनमें से 65 फीसदी ही चलने लायक है। चौड़ी सड़कों की तुलना में गलियों पर दबाव अधिक है। यदि यहां व्यवस्थित फुटपाथ, जेब्रा क्रॉसिंग, रैंप, बैरिकेडिंग और स्ट्रीट फर्नीचर को विजन 2030 के मानकों के आधार पर विकसित किया जाए तो पैदल यात्रियों का अनुभव कहीं अधिक सुरक्षित, सहज और आनंददायक बन सकता है।
ये करने की जरूरत-
भविष्य की योजना में 'वॉकएथल सिटी की अवधारणा को प्राथमिकता देनी होगी। चौड़े, बाधारहित और सुरक्षित पैदल पथ, हरित कॉरिडोर और साइकिल ट्रैक आदि अधिकाधिक काम करने की जरूरत है।
जयपुर के लिए तैयार मास्टर प्लान-2026 को जमीन पर उतारने में जेडीए विफल रहा। लोगों को मूलभूत जरूरतें ही उपलब्ध नहीं करवा पाया। इनमें सेक्टर रोड से लेकर ड्रेनेज शामिल है। प्लान में हरित क्षेत्र, ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और आवासीय विकास का खाका प्रस्तुत किया गया है। लेकिन इनको धरातल पर उतारने में सरकारें भी फेल रही हैं।
हद तो तब हो गई जब मौजूदा मास्टरप्लान को दो वर्ष के लिए आगे बढ़ा दिया है। मास्टरप्लान की अनदेखी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि व्यावसायिक गतिविधियां आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी हैं।
ये जरूरत-
वर्ष 2030 तक शहर को व्यवस्थित बनाना है, तो मास्टर प्लान के प्रावधानों का सख्ती से पालन और अवैध निर्माणों पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक होगा।
आज जयपुर विकास और अव्यवस्था के दौराहे पर खड़ा है। जिस तरह से जयपुर की आबादी बढ़ रही है। उसको ध्यान में रखे हुए व्यवस्थित विकास की जरूरत है। फिर चाहे ये ट्रैफिक से जुड़ा हो या फिर बसावट से। अवैध कॉलोनियों को बसने से रोकना होगा। ट्रांजिट आधारित विकास और पैदल पथों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
तभी वर्ष 2030 का जयपुर अधिक सुव्यवस्थित, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल शहर के रूप में उभरेगा। यदि सरकार ने जोर नहीं दिया तो अनियोजित विस्तार, ट्रैफिक दबाव व सुविधाओं की कमी शहर के विकास को बाधित करती रहेगी।
नेहा खुल्लर, कार्यकारी निदेशक, मुस्कान एनजीओ