कुलिश जन्मशती पर्व: पत्रिका समूह के संस्थापक संपादक श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश जी का मानना था कि जड़ से जुड़े रह कर ही विकास संभव है।
आज की सरकार 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। लेकिन, विकसित भारत का सूत्र और आधार क्या हो? सही मायने में विकसित भारत का स्वरूप कैसा होगा? इस सवाल का जवाब एक जैसा नहीं है। लेकिन, जब बात इसकी मूल अवधारणा की करें तो मतभेद की गुंजाइश काफी कम रह जाएगी।
‘राजस्थान पत्रिका’ के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश ने दशकों पहले उन मूल अवधारणाओं की बात की थी, जिन पर विकसित देश की नींव रखी जा सकती है।
क्या बढ़ती जनसंख्या विकास में बाधक है? इस सवाल पर अलग-अलग राय सामने आती है। लेकिन, कुलिश जी की राय जनसंख्या का सही इस्तेमाल करने के पक्ष में थी। उनका साफ मानना था, ‘आबादी को धरती का भार न समझें’।
जनसंख्या नियंत्रण के बढ़ते शोर के बीच एक लेख में उन्होंने लिखा था, ‘अमरीका से कोई नारा चलता है और हम लोग ‘स्याल सीटी’ बजाना शुरू कर देते हैं। अमरीका में एक नारा लगा कि दुनिया की आबादी बढ़ रही है, अतः उस पर रोक लगाई जाए, क्योंकि आबादी बढ़ते रहने के कारण गरीब मुल्कों को विकास योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। जितना भी माल पैदा होता है, उसे बढ़ती हुई आबादी चट कर जाती है।’
उन्होंने न केवल पश्चिम के अंधानुकरण की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया, बल्कि जन-शक्ति के सही इस्तेमाल की जरूरत भी बताई। उन्होंने लिखा, ‘आबादी की बढ़ोतरी गरीब मुल्कों में है और उसकी चिंता अमीर मुल्कों को सता रही है। गरीब देशों में आबादी का बढ़ना अच्छा नहीं है, यह सही बात है। प्रश्न यह है कि क्या संख्या ही देश का मापदंड है या मानव जीवन का निचोड़ है? हमारे देश में जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय क्या हों और जनसंख्या का उपयोग किस तरह हो, यह भी एक सवाल है? ऐसा कोई उपाय देखने में नहीं आता, जिससे मनुष्य को स्वस्थ-सुचारू जीवन व्यतीत करने की शिक्षा दी जाए या उसके लिए प्रेरित किया जाए।’
कुलिश जी विकास के लिए विज्ञान को जरूरी मानते थे और विज्ञान के नाम पर रूढ़ियों को हवा देने के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे थे। एक लेख में उन्होंने लिखा, ‘यहां (भारत) अपना कोई विज्ञान नहीं माना जाता, बल्कि उधार में मिले ज्ञान के रूप में विज्ञान का आयात होता है। विज्ञान के नाम पर धन की लूट हो रही है, अंधविश्वास फैल रहा है और न जाने क्या-क्या हो रहा है, परंतु मजाक भी कम नहीं हो रहा है।’
कुलिश जी ने विज्ञान की जो व्याख्या की, उस रूप में विज्ञान का प्रयोग विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। उन्होंने लिखा, ‘विज्ञान के नाम पर जो परिवर्तन नित्य प्रति होते रहते हैं, वे वास्तव में अनुभव की श्रेणी में आते हैं। अनुभव शब्द का अर्थ ही ‘बाद में पैदा होना’ है। [अनु+भव] ठोकर खाने से चोट लगती है। यह अनुभव का स्वरूप है। ठोकर न खाना और ठोकर से बचना विज्ञान है। विज्ञान-दृष्टि से ही हम ठोकर खाने से बच सकते हैं। यही दृष्टि विज्ञान का विषय है।’
कुलिश जी की एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह शिक्षा को रोजगार से जोड़ने के सख्त खिलाफ थे। शिक्षा की गिरती गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने लिखा था, ‘जब से मैकाले छाप शिक्षा प्रणाली चालू हुई तब से हमारा जोर शिक्षक के बजाय स्कूल भवनों पर अधिक हो गया।’
शिक्षा को लेकर उनका नजरिया कुछ इस तरह का था, ‘मनुष्य में सबसे महत्वपूर्ण तत्व बुद्धि है। बुद्धि के कारण ही हम उचित-अनुचित, हित-अहित और नीति-अनीति का भेद कर पाते हैं। यही हमें पशु से ऊपर उठाती है। सच पूछो तो बुद्धि ही मनुष्य की पहचान है। इसको हम ज्ञान के द्वारा विकसित कर सकते हैं। यही वह तत्व है जो तन और मन पर अंकुश भी रख सकता है। बुद्धि को समष्टि जीवन की दिशा देना ही सच्ची शिक्षा है।’ ऐसी सच्ची शिक्षा ही विकसित देश का आधार बन सकती है।
कुलिश जी उद्योग को समृद्धि का साधन मानते थे, लेकिन इस बात के भी पक्के हिमायती थे कि खेती को उद्योग-व्यापार न बनाया जाए। उनका साफ मानना था, ‘यह सच है कि उद्योग ही समृद्धि के साधन हैं। यह युग भी उद्योग-प्रधान है, परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उद्योगों का आधार कृषि है। कृत्रिम वस्तुएं पैदा करके भी समृद्धि बढ़ाई जा सकती है, परंतु वह असली वस्तुओं का स्थान नहीं ले सकती। हमें रहन-सहन के लिए प्राकृतिक पदार्थों पर ही निर्भर करना है।’ मूल से अलग होकर कोई विकास नहीं कर सकता।
(यह आलेख श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)