
जयपुर. दोपहर के भोजन के बाद आने वाली नींद को सिर्फ आलस्य मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। लंदन और उरुग्वे के वैज्ञानिकों के शोध में सामने आया है कि दिन की एक नियमित झपकी मस्तिष्क को 3 से 7 वर्ष तक युवा बनाने में कारगर है।
3.8 लाख लोगों के आनुवंशिक आंकड़ों के विश्लेषण में दिन में झपकी लेने वालों के मस्तिष्क का आकार औसत 15.8 घन सेमी अधिक पाया गया। इसी आधार पर डे-नैप और मस्तिष्क की सेहत के बीच संबंध को लेकर शोध में नई चर्चा शुरू हुई है। राजस्थान जैसे मरु प्रदेश सहित अधिक गर्मी वाले देशों और प्रदेशों के लिए यह शोध महत्वपूर्ण है। जयपुर को ही ले, यहां से बड़ी संख्या में लोग शहर के दूरस्थ इलाकों में नौकरी और कारोबार के लिए जाते हैं। लंबी आवाजाही, शहर का ट्रैफिक, स्क्रीन पर काम और ऑफिस का मानसिक दबाव दोपहर तक थकान बढ़ा सकता है। बैंकों, निजी कंपनियों, मीडिया हाउस, कॉल सेंटर और आईटी क्षेत्र में लगातार बैठकर काम करने वालों के लिए 10-20 मिनट की पावर नैप व्यावहारिक ब्रेक हो सकती है।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) और यूनिवर्सिटी ऑफ द रिपब्लिक (उरुग्वे) के शोधकर्ताओं ने जीवनशैली के भ्रम को दूर करने के लिए मेंडेलियन रैंडमाइजेशन नामक आनुवंशिक तकनीक का सहारा लिया। 3,78,000 से अधिक लोगों के डेटा और 35,000 से अधिक उच्च-रिजॉल्यूशन एमआरआई स्कैन के विश्लेषण से यह सिद्ध हुआ कि झपकी लेने वालों के मस्तिष्क का आयतन बिना झपकी लेने वालों की तुलना में औसतन 15.8 क्यूबिक सेंटीमीटर अधिक सुरक्षित रहता है।
10-20 मिनट : 10-20 की मिनट की झपकी से सुस्ती कम रहने और सतर्कता बढ़ने में मदद मिल सकती है। इसे आदर्श माना जाता है।
30-60 मिनट : गहरी नींद में जाने की संभावना। सीखने और स्मृति से जुड़े कुछ लाभ मिल सकते हैं, लेकिन उठने के बाद कुछ समय स्लीप इनर्शिया यानी सुस्ती रह सकती है।
90 मिनट : पूरे नींद चक्र के बराबर। नींद की भारी कमी में उपयोगी। नियमित दिनचर्या में हर व्यक्ति को इसकी जरूरत नहीं।
"दिनभर लगातार सूचनाओं, मोबाइल स्क्रीन और काम के दबाव के बीच मस्तिष्क को भी रिकवरी का समय चाहिए। राजस्थान जैसे गर्म प्रदेश में दोपहर की थकान और सुस्ती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहां वर्ष के लंबे हिस्से में दिन के समय गर्मी का असर रहता है। ऐसे में नियंत्रित और छोटी झपकी काम के बीच मानसिक ताजगी देने वाला ब्रेक हो सकती है। इसका मतलब काम से भागना नहीं, बल्कि मस्तिष्क को थोड़ी देर रिकवरी का समय देना है।"
- डॉ. अनिल तांबी, मनोरोग निदान विशेषज्ञ, जयपुर