
देवली. दिगंबर जैन मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि भगवान की पूजा, जिनालय दर्शन और शुद्ध आचरण के समन्वय से ही आत्मकल्याण संभव है। केवल कर्मकांड या बाहरी धार्मिक प्रदर्शन से धर्म की वास्तविक प्रभावना नहीं हो सकती। धर्म तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में दिखाई दे।
स्थानीय महावीर मंदिर में प्रवचन के दौरान मुनि ने श्रावकों के छह आवश्यककों में पूजा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान की भक्ति से अर्जित पुण्य मोक्षकारक होता है। यह जीव को संसार में उलझाने के बजाय धीरे-धीरे संसार से मुक्ति और मोक्ष की दिशा में ले जाता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में साक्षात तीर्थंकरों के दर्शन संभव नहीं हैं, इसलिए जिनालय को भगवान के समवसरण की भावना से देखना चाहिए। देहरी का स्पर्श कर श्रद्धापूर्वक माथा टेकने और जिनेंद्र भगवान की आराधना करने से पुण्य का अर्जन तथा कर्मों की निर्जरा होती है। अभिषेक की धार्मिक विधि बताते हुए उन्होंने पंचपरमेष्ठी, जिनधर्म, जिनागम, जिनचैत्य और जिनचैत्यालय सहित नवदेवताओं को वंदनीय बताया। परिक्रमा को भगवान की सर्वदिशात्मक उपस्थिति की भावना से जुड़ी धार्मिक साधना बताया।
मुनि ने कहा कि जिनधर्म की वास्तविक आराधना शुद्ध आचरण से होती है। व्यक्ति की पहचान उसके व्यवहार और चरित्र से होती है। उन्होंने कहा कि वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। आत्मा का स्वभाव जानना और देखना है। क्रोध, लोभ आदि विकारों में जाने पर व्यक्ति आत्मस्वभाव से दूर हो जाता है। जिनधर्म व्यक्ति को अपने आत्मस्वभाव में स्थित रहने का मार्ग दिखाता है।
फोटो कैप्शन:
देवली. महावीर मंदिर में प्रवचन करते मुनि सुप्रभ सागर महाराज।