राजस्थान में पर्यावरण और जनहित मामलों में कोर्ट के आदेशों की पालना नहीं हो पा रही। सांगानेर में कारखानों का जहरीला पानी, अवैध खनन और ओरण भूमि की अधूरी मैपिंग समस्याएं बनी हुई हैं। थानों में सीसीटीवी और बजरी सप्लाई भी अधूरी है। पढ़ें शैलेंद्र अग्रवाल की रिपोर्ट...
जयपुर: राजस्थान में पर्यावरणीय संतुलन के लिए सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बार-बार सख्त निर्देश दिए। लेकिन पालना में हर बार सरकारी ढिलाई साफ नजर आई। स्थिति यह है कि जयपुर के सांगानेर में रंगाई-छपाई कारखानों के जहरीले पानी से बचाने के लिए कोर्ट ने आदेश दिया। लेकिन सालों बाद भी कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट पूरी तरह चल नहीं पाया।
पर्यावरण मंजूरी के बाद ही बजरी खनन की लीज जारी करने के आदेश की पालना न होने से अवैध खनन जबरदस्त बढ़ गया, जिससे हाईकोर्ट को अवैध खनन की जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी। ओरण भूमि को सुरक्षित करने का कार्य अभी गति नहीं पकड़ पाया।
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निर्देशों की अवहेलना में प्रशासनिक अफसरों की भूमिका संदिग्ध है। प्रदेश में जनहित से जुड़े मामलों में नाफरमानी लगातार बढ़ रही है। नतीजा, न्याय न मिलने से हताश याचिकाकर्ताओं को आदेश के बाद भी फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। इसी वजह से अवमानना के मामले भी बढ़ रहे हैं।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित अवमानना याचिकाओं की संख्या इस बात की तस्दीक करती है। मार्च 2025 तक के आंकड़े केंद्रीय कानून मंत्रालय ने राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड में जारी किए हैं। इसके अनुसार, 25 हाईकोर्ट में से 22 में अवमानना के 1.43 लाख केस न्याय के इंतजार में हैं।
जयपुर में सांगानेर के रंगाई-छपाई कारखानों का रसायनयुक्त पानी सीधे द्रव्यवती नदी में छोड़ने से रोकने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने सीईटीपी लगने का आदेश दिया। प्लांट लग गया, लेकिन सभी कारखाने नहीं जुड़ने से इसके बंद होने की नौबत आ गई। कारखानों के जहरीले पानी से सब्जियां उगाने की शिकायत पर प्रशासन मौन है। यह पानी भूजल व कृषि भूमि को भी प्रभावित कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले में हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेआर गोयल की अध्यक्षता में कमेटी तो बन गई, लेकिन उसे ओरण भूमि का पूरा रिकॉर्ड ही नहीं मिल पाया है। वर्तमान स्थिति की बात करें तो 41 में से 15 जिलों का रिकॉर्ड ही मिला है। इससे सांस्कृतिक-धार्मिक महत्व की ओरण भूमि की न मैपिंग का कार्य शुरू हो पाया और न अतिक्रमण चिन्हित करने का कार्य आगे बढ़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने करीब पांच साल पहले थानों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य करने के आदेश दिए, ताकि हिरासत में लिए गए लोगों के अधिकार सुरक्षित रह सकें। प्रदेश के अधिकांश थानों में कैमरे तो लग चुके, लेकिन उनकी मॉनिटरिंग और रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने का मैकेनिज्म अब तक तय नहीं है।
टोंक, बूंदी और सवाई माधोपुर सहित कई जिलों में अवैध खनन जारी है। लीज तो जारी की जा रही हैं, लेकिन पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया पर सुस्ती है। इससे बजरी का अवैध खनन हो रहा है और कानून होने के बावजूद रेट तय नहीं होने से लोग मनमानी दर पर बजरी खरीदने को मजबूर हैं।
अभी जो व्यवस्था है, उसमें तो अवमानना याचिका पर ही कोर्ट का आदेश संभव है। प्रशासन हमेशा सोता रहता है। यही गैप की वजह है। जैसे जयपुर में अमानीशाह नाले का मामला है, बदबू आती है तब लोगों को ही आगे आना पड़ेगा। हालांकि, यह आदर्श स्थिति नहीं है।
-सुनील अम्बवानी, पूर्व मुख्य न्यायाधीश, राजस्थान हाईकोर्ट
जनहित से जुड़े मामले तीन तरह से कोर्ट पहुंचते हैं। अदालती आदेश की पालना न होने पर प्राइवेट व्यक्ति कोर्ट पहुंचता है। वहीं, स्वप्रेरणा से दर्ज मामलों में कोर्ट स्वयं मॉनिटर करता है। जनहित के मामले में आदेश की पालना न होने पर याचिकाकर्ता से अलग व्यक्ति भी अवमानना याचिका लगा सकता है। कोर्ट भी जनहित से जुड़े सभी मामलों को मॉनिटर नहीं कर सकता।
-आरएन माथुर, वरिष्ठ अधिवक्ता, राजस्थान हाईकोर्ट