
जयपुर। सत्ता से बाहर होने के बाद प्रदेश कांग्रेस में विधायकों की राजनीतिक हैसियत और भूमिका में बड़ा बदलाव नजर आ रहा है। राज्य की पिछली कांग्रेस सरकार में विधायक अपने समर्थकों को पंचायत-निकाय चुनावों में टिकट दिलाने से लेकर संगठन में नियुक्तियां कराने तक प्रभावी भूमिका में थे। सरकार का समर्थन करने वाले निर्दलीय विधायक भी अपने क्षेत्रों में संगठन और टिकट वितरण में निर्णायक माने जाते थे।
अब राजस्थान नगर निकाय चुनाव में संगठन ने टिकट चयन की कमान अपने हाथ में रखी है। विधायक टिकट तय करने के बजाय अपने समर्थकों के नाम पैनल में शामिल कराने के लिए जिलाध्यक्ष, प्रभारी और पर्यवेक्षकों से पैरवी कर रहे हैं। अब नामांकन शुरू होने के बीच कांग्रेस में टिकट चयन की प्रक्रिया अंतिम दौर में है।
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में विधायकों को सत्ता के साथ संगठन और चुनावी टिकट वितरण में भी काफी अधिकार मिले हुए थे। विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस संगठन की नियुक्तियों से लेकर पंचायत और निकाय चुनाव के टिकट तक विधायक की पसंद को महत्व मिलता था। सरकार का साथ देने वाले निर्दलीय विधायक भी अपा क्षेत्रों में इसी तरह प्रभावी थे। कई जगह संगठनात्मक फैसलों में भी उनकी राय निर्णायक रहती थी।
इस बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने टिकट चयन की प्रक्रिया संगठन के स्तर पर रखी है। उनके निर्देश पर जिला प्रभारी और विधानसभा समन्वयक पिछले तीन दिन से नेताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं। इन बैठकों का बुधवार को अंतिम दिन है। रात तक या गुरुवार तक प्रत्येक प्रभारी को अपने जिले और विधानसभा क्षेत्र के निकायों में तीन-तीन नामों के पैनल सौंपने हैं। पैनल जमीनी फीडबैक और नेताओं की सहमति के आधार पर तैयार किए जा रहे हैं। ऐसे में निकाय चुनाव सिर्फ प्रत्याशी चयन का मामला नहीं, बल्कि कांग्रेस में संगठन और विधायकों के बीच बदले राजनीतिक शक्ति-संतुलन की परीक्षा भी माना जा रहा है।
सभी प्रभारी और विधानसभा समन्वयक नेताओं से चर्चा कर सहमति से तीन-तीन नामों के पैनल तैयार कर रहे हैं। जहां सहमति होगी, वहां सिंबल वितरित कर दिए जाएंगे। किसी स्थान पर विवाद होने पर प्रदेश स्तर से वरिष्ठ कोऑर्डिनेटर भेजकर सहमति के आधार पर टिकट तय किए जाएंगे।
-गोविंद सिंह डोटासरा, प्रदेश अध्यक्ष।