
बहुचर्चित प्रशासनिक भ्रष्टाचार 'जल जीवन मिशन' (JJM) घोटाले में फंसे पूर्व जलदाय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेश जोशी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई के बाद महेश जोशी को किसी भी प्रकार की न्यायिक राहत देने से साफ शब्दों में इंकार कर दिया। अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध बताने वाली याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। इस अदालती फैसले के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि पूर्व कैबिनेट मंत्री महेश जोशी को फिलहाल न्यायिक अभिरक्षा के तहत जेल की सलाखों के पीछे ही वक्त गुजारना होगा। इस हाई-प्रोफाइल मामले में आ रहे नित नए कानूनी मोड़ों ने राजस्थान के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर केंद्र सरकार की सबसे बड़ी पेयजल योजना में हुए करोड़ों रुपये के गबन से जुड़ा हुआ है।
पूर्व मंत्री महेश जोशी की तरफ से उनके बेटे रोहित जोशी ने राजस्थान हाईकोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की पूरी कार्रवाई को चुनौती दी थी। इस महत्वपूर्ण मामले पर सुनवाई के बाद जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की संयुक्त खंडपीठ ने अपना अंतिम आदेश जारी किया।
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता रोहित जोशी की उन तमाम दलीलों और प्रार्थनाओं को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि पूर्व मंत्री को हिरासत में लेते समय नियमों की अनदेखी की गई थी। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद कांग्रेस खेमे और महेश जोशी के कानूनी सलाहकारों को तगड़ा झटका लगा है, जो इस तकनीकी आधार पर पूर्व मंत्री की जेल से रिहाई का रास्ता साफ करने की उम्मीद लगाए बैठे थे।
अदालती दस्तावेजों और पूर्व में हुई प्रारंभिक सुनवाइयों के अनुसार, रोहित जोशी की तरफ से अदालत में पैरवी कर रहे वकीलों ने मुख्य रूप से नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तकनीकी नियमों का हवाला देते हुए एक बड़ा दांव खेला था।
याचिका में पीड़ित पक्ष की ओर से एडवोकेट अमन अग्रवाल और नेहा गोयल ने दलील दी थी कि एसीबी की विशेष जांच टीम (SIT) ने गत 7 मई को तड़के जब महेश जोशी को उनके जयपुर स्थित आवास से गिरफ्तार किया था, तब उनके परिजनों को इस गिरफ्तारी के पुख्ता कानूनी कारणों की लिखित जानकारी समय पर मुहैया नहीं कराई गई थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि बीएनएसएस के कड़े प्रावधानों के तहत किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी के समय उसके परिवार को लिखित नोटिस देना अनिवार्य है, और ऐसा न होने से पूरी गिरफ्तारी प्रक्रिया दूषित और गैर-कानूनी हो जाती है। इसी आधार पर उन्होंने महेश जोशी को तुरंत रिहा करने की मांग की थी।
इस हाई-प्रोफाइल अदालती जंग में राज्य की भाजपा सरकार की ओर से पक्ष रखने के लिए खुद महाधिवक्ता (AG) राजेंद्र प्रसाद और अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश चौधरी ने कमान संभाली। सरकारी वकीलों ने अदालत के सामने एसीबी की केस डायरी और तकनीकी साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए याचिकाकर्ता के सभी दावों की हवा निकाल दी।
महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने खंडपीठ के सामने बेहद मजबूत तर्क रखते हुए कहा, "पूर्व जलदाय मंत्री की गिरफ्तारी पूरी तरह से पारदर्शी और कानून सम्मत तरीके से की गई है। जब 7 मई की सुबह एसीबी की टीम उनके आवास पर पहुंची, तब उनके परिवार के सदस्य स्वयं मौके पर मौजूद थे और उन्हें हिरासत में लेने की वजह भली-भांति पता थी। इसके बाद जब आरोपी को विशेष अदालत में पेश करने के लिए एसीबी मुख्यालय से रवाना किया गया, तब भी और कोर्ट परिसर पहुंचने के बाद भी, जांच अधिकारियों ने फोन के जरिए खुद याचिकाकर्ता रोहित जोशी को हर गतिविधि की लाइव सूचना दी थी।"
सरकार की इस दलील को निचली विशेष अदालत ने भी पहले सही माना था, जिस पर अब हाईकोर्ट ने भी अपनी अंतिम मुहर लगा दी है।
जल जीवन मिशन (JJM) से जुड़ा यह पूरा भ्रष्टाचार मामला साल 2021 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल के दौरान का है। आरोप है कि केंद्र सरकार द्वारा हर घर जल पहुंचाने के लिए भेजे गए करोड़ों रुपये के फंड का उपयोग चुनिंदा फर्मों को अवैध लाभ पहुंचाने के लिए किया गया:
फर्जी क्रेडेंशियल का खेल: इस घोटाले का भंडाफोड़ तब हुआ जब जांच में सामने आया कि 'श्री श्याम ट्यूबवेल' और 'श्री गणपति ट्यूबवेल' जैसी निजी फर्मों के संचालकों ने इरकॉन (IRCON) जैसी प्रतिष्ठित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के फर्जी और कूटरचित अनुभव प्रमाण पत्र (Fake Experience Certificates) तैयार किए।
960 करोड़ रुपये के टेंडर: जलदाय विभाग के आला अधिकारियों और तत्कालीन मंत्री महेश जोशी की कथित मिलीभगत से इन फर्जी दस्तावेजों को सही मानते हुए करीब 960 करोड़ रुपये के टेंडर इन दागदार कंपनियों को जारी कर दिए गए।
लाखों का लेनदेन: एसीबी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की समानांतर जांच में यह सामने आया है कि इन टेंडरों को पास कराने और घटिया सामग्री के इस्तेमाल की अनदेखी करने के एवज में करोड़ों रुपये की रिश्वत और कमीशन का लेनदेन सीधे सचिवालय से लेकर मंत्रियों के करीबियों तक किया गया था।
महेश जोशी की यह कानूनी लड़ाई बेहद पेचीदा रही है क्योंकि वे देश की दो सबसे बड़ी भ्रष्टाचार रोधी जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। इस मामले में समानांतर रूप से मनी लॉन्ड्रिंग की जांच भी चल रही है।
इससे पहले साल 2025 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए पूर्व मंत्री महेश जोशी को गिरफ्तार किया था। उस दौरान वे करीब 7 महीने तक जेल में बंद रहे थे, जिसके बाद दिसंबर 2025 में उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत से सशर्त जमानत मिली थी। लेकिन जेल से बाहर आने के कुछ ही महीनों बाद राजस्थान की राज्य स्तरीय एजेंसी एसीबी ने अपनी एफआईआर के आधार पर 7 मई 2026 को उन्हें दोबारा दबोच लिया। इसी मामले में जलदाय विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) और पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. सुबोध अग्रवाल को भी 9 अप्रैल को गिरफ्तार किया जा चुका है, जो वर्तमान में जेल में बंद हैं।