
राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों और चिकित्सकीय व्यवस्थाओं में आ रही कमियों को देखते हुए राज्य सरकार ने अब एक बेहद कड़ा और संवेदनशील फैसला लिया है। प्रदेश में मातृ मृत्यु दर पर पूरी तरह अंकुश लगाने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में एक नया स्पेशल हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम लागू कर दिया गया है। इसके तहत अब 'हाई रिस्क' प्रेग्नेंसी यानी उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं पर स्वास्थ्य विभाग 'एक्स्ट्रा अटेंशन' देगा। शनिवार को स्वास्थ्य भवन में आयोजित एक उच्च स्तरीय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों, सीएमएचओ और अस्पताल अधीक्षकों को सख्त लहजे में निर्देश दिए कि राज्य के किसी भी सरकारी चिकित्सा संस्थान में किसी भी मरीज या गर्भवती महिला की मृत्यु चिकित्सकीय लापरवाही के कारण बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। अगर किसी भी स्तर पर मॉनिटरिंग में ढिलाई पाई गई, तो संबंधित डॉक्टरों और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ सीधे सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सरकार के नए नियमों के मुताबिक, ग्रामीण और ढाणियों में रहने वाली उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी अब स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों की होगी।
प्रदेश की प्रत्येक हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिला को एक समर्पित एएनएम (ANM) की सीधी निगरानी में रखा जाएगा। आपातकालीन स्थिति उत्पन्न होने पर एएनएम तुरंत मरीज को डॉक्टर के पास ले जाने की व्यवस्था सुनिश्चित करेगी।
मुख्य सचिव ने साफ निर्देश दिए हैं कि हाई रिस्क गर्भवती महिला से जुड़ी एएनएम प्रति 3 दिन बाद अनिवार्य रूप से महिला के घर जाकर व्यक्तिगत संपर्क करेगी और उसके बीपी, हीमोग्लोबिन तथा अन्य स्वास्थ्य मानकों की जांच करेगी।
सरकारी अस्पतालों के लेबर रूम और ऑपरेशन थिएटर में स्वच्छता और आपातकालीन दवाओं की उपलब्धता को लेकर नए वर्किंग प्रोटोकॉल लागू किए गए हैं।
अस्पतालों से डिजिटल मैपिंग: सभी चिन्हित हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को उनके नजदीकी उपयुक्त अस्पताल जैसे सीएचसी (CHC), उपजिला अस्पताल, जिला अस्पताल या सीधे मेडिकल कॉलेज से पहले ही मैप कर दिया जाएगा, ताकि प्रसव पीड़ा शुरू होते ही उन्हें रेफरल के चक्कर न काटने पड़ें।
डेली एक्टिविटी रिपोर्ट: अस्पतालों को अब प्रतिदिन अपने ओटी, आईसीयू और लेबर रूम की क्रियाशीलता, वहां इलाज पा रहे मरीजों की कुल संख्या और बेड की उपलब्धता की रिपोर्ट एक तय स्टैंडर्ड फॉर्मेट में मुख्यालय भेजनी होगी। इसके साथ ही सर्जन के सभी रिक्त पदों को तुरंत प्रभाव से भरने के निर्देश भी दिए गए हैं।
प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य गायत्री राठौड़ ने विभाग द्वारा उठाए जा रहे व्यावहारिक कदमों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रसूताओं की मौतों के पीछे के सामुदायिक और संस्थागत कारणों को जानने के लिए अस्पतालों में एक विशेष 'मातृ मृत्यु ऑडिट कमेटी' बनाई गई है, जिसमें अलग-अलग विभागों के विशेषज्ञों को शामिल कर प्रति सप्ताह अनिवार्य रूप से समीक्षा की जाएगी।
इसके साथ ही राजस्थान में 15 July से एक 5 दिवसीय विशेष स्क्रीनिंग अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान में एएनएम, सीएचओ (CHO) और आशा वर्कर घर-घर जाकर प्रत्येक गर्भवती महिला को ट्रैक कर रही हैं ताकि हाई रिस्क लक्षणों वाली महिलाओं की पहचान समय रहते की जा सके।
गर्भवती महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी), न्यूट्रिशन (पोषण) और दो बच्चों के बीच अंतर रखने जैसे विषयों पर स्त्री रोग विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर एक 'गुड कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजी' बनाई जा रही है।
इस बैठक में चिकित्सा शिक्षा आयुक्त बाबूलाल गोयल, एनएचएम मिशन निदेशक डॉ. रवि प्रकाश शर्मा और अतिरिक्त मिशन निदेशक डॉ. टी. शुभमंगला सहित राज्य के सभी प्रमुख मेडिकल कॉलेजों (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, कोटा, अजमेर) के विशेषज्ञ डॉक्टर उपस्थित रहे।