JJM Scam Rajasthan: पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान जलदाय विभाग में तबादलों का ऐसा समानांतर तंत्र सक्रिय था, जिसकी पकड़ मंत्री कार्यालय से लेकर बड़े प्रोजेक्ट्स तक मानी जाती थी। पूर्व मंत्री के 22 महीने के कार्यकाल में 40 से अधिक तबादला सूचियां जारी हुई थी।
जयपुर। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान जलदाय विभाग में तबादलों और पोस्टिंग का एक ऐसा समानांतर तंत्र सक्रिय था, जिसकी पकड़ मंत्री कार्यालय से लेकर बड़े प्रोजेक्ट्स तक मानी जाती थी। विभागीय हलकों में चर्चा थी कि जल जीवन मिशन (जेजेएम) और शहरी पेयजल परियोजनाओं में किस इंजीनियर को कहां लगाया जाएगा, इसका निर्णय विभागीय प्रक्रिया से ज्यादा बाहरी प्रभाव के आधार पर होता था। एसीबी की जांच में सामने आए तथ्यों और विभागीय दस्तावेजों के आधार पर यह भी चर्चा में है कि उस दौर में विभाग का तबादला सिस्टम कुछ चुनिदा लोगों के इशारों पर संचालित हो रहा था।
सहायक अभियंता से लेकर अतिरिक्त मुख्य अभियंता स्तर तक की पोस्टिंग में प्रोजेक्ट की लागत, ठेकेदारों की पसंद और संभावित 'सेवा शुल्क' जैसे शब्द विभागीय गलियारों में खुलेआम तैरते रहे। पूर्व मंत्री के करीब 22 महीने के कार्यकाल में विभाग में 40 से अधिक तबादला सूचियां जारी हुई। इनमें कई आदेश ऐसे रहे, जिनमें कुछ घंटों के भीतर ही संशोधन या निरस्तीकरण कर दिया गया। विभागीय सूत्रों के अनुसार कई इंजीनियरों को पहले महत्वपूर्ण जेजेएम प्रोजेक्ट्स पर लगाया गया, फिर अचानक एपीओ कर दिया गया और बाद में दोबारा पोस्टिंग दे दी गई।
तबादला आदेशों के इस खेल ने विभागीय कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए। सूत्रों के मुताबिक करीब 35 इंजीनियर ऐसे रहे, जिन्हें तबादले के कुछ घंटे बाद ही एपीओ कर दिया गया। कई अधिकारियों को महीनों तक बिना स्पष्ट जिम्मेदारी के रखा गया। विभागीय कर्मचारियों के बीच यह भी चर्चा रही कि किस इंजीनियर को किस प्रोजेक्ट पर लगाया जाएगा, इसका फैसला तकनीकी आवश्यकता से ज्यादा नेटवर्क' तय करता था।
जेजेएम के बड़े प्रोजेक्ट्स में कई इंजीनियरों को उनके मूल जिले से 100 से 150 किलोमीटर दूर तक अतिरिक्त प्रभार दिए गए। उदयपुर संभाग के अधिकारियों को बांसवाड़ा और डूंगरपुर जैसे जिलों की जिम्मेदारी सौंपी गई। वहीं, कुछ अधिकारियों को एक साथ कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिए जाने को लेकर भी सवाल उठे।
विभागीय चर्चाओं में यह मामला भी लंबे समय तक बना रहा कि जयपुर शहर की पाइपलाइन परियोजना से जुड़े एक इंजीनियर को अतिरिक्त प्रभार दिलाने के लिए मोटी रकम के लेनदेन की चर्चा हुई थी। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि जांच एजेंसियों की ओर से अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।
विभागीय गलियारों में उस दौर के प्रभावशाली नेटवर्क को लेकर तरह-तरह के तंज भी प्रचलित थे। कई अधिकारी मजाक में कहते थे, 'यहां पहले से दिख जाता है कि अगली तबादला सूची में कौन एपीओ होगा। सूत्र बताते हैं कि तबादला सूची जारी होने से पहले ही कई इंजीनियरों को अपने आदेशों की जानकारी मिल जाती थी। इससे विभाग में यह धारणा मजबूत होती गई कि आधिकारिक प्रक्रिया से ज्यादा असर अनौपचारिक ताकतों का है।