
राजस्थान में 309 नगर निकायों के अध्यक्ष और नगर परिषद के सभापति पद के लिए होने जा रहे महत्वपूर्ण मतदान से ठीक 24 घंटे पहले राज्य के राजनीतिक और कानूनी गलियारों में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम देखने को मिला। आज सोमवार को प्रस्तावित मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले विभिन्न जिलों के प्रत्याशियों और पार्षदों के खिलाफ पुलिस FIR और संभावित गिरफ्तारी की आशंका वाले 6 अलग-अलग मामलों में रविवार के दिन छुट्टी होने के बावजूद राजस्थान हाईकोर्ट की दो अलग-अलग एकल पीठों ने रात 10:30 बजे तक विशेष सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश की विशेष अनुमति से बैठी न्यायाधीश नूपुर भाटी, न्यायाधीश कुलदीप माथुर और न्यायाधीश सुनील बेनीवाल की पीठ ने जनप्रतिनिधियों के लोकतांत्रिक और वोटिंग अधिकार की रक्षा करते हुए परिस्थितियों की गंभीरता को समझा और याचिकाकर्ताओं को दंडात्मक कार्रवाई व गिरफ्तारी से अंतरिम राहत प्रदान की।
राजस्थान के निकाय चुनाव में सभापति और अध्यक्ष बनने की रस्साकशी के बीच कई जिलों में ऐन चुनाव से पहले प्रत्याशियों और उनके समर्थक पार्षदों के खिलाफ अचानक दर्ज हुई आपराधिक एफआईआर को हाईकोर्ट ने बेहद गंभीरता से लिया। अदालती कार्यवाही के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और बदले की भावना के तहत चुनाव के ठीक 24 से 48 घंटे पहले झूठे मुकदमे दर्ज करवाकर प्रत्याशियों को मतदान प्रक्रिया से वंचित करने और उनके समर्थकों पर प्रशासनिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। रविवार रात तक चले इस मैराथन कानूनी दांव-पेच के बाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए स्टे ऑर्डर से प्रदेश की स्थानीय राजनीति में भारी हलचल मच गई है और चुनाव का पूरा समीकरण बदल गया है।
हनुमानगढ़ नगर परिषद में सभापति चुनाव को लेकर जारी खींचतान के बीच हाईकोर्ट से याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है।
सुमित व 9 पार्षदों की याचिका: सुमित और उनके साथ 9 निर्वाचित पार्षदों ने गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए याचिका दायर की थी। न्यायाधीश नूपुर भाटी की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सभी पार्षदों की गिरफ्तारी पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी।
पार्षद मंजू को दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण: हनुमानगढ़ से सभापति पद की उम्मीदवार पार्षद मंजू की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि भंसाली ने कोर्ट में दलील दी कि राजनीतिक विद्वेष के चलते उन्हें परेशान किया जा रहा है ताकि वे मतदान में हिस्सा न ले सकें।
नो दंडात्मक कार्रवाई का आदेश: न्यायाधीश कुलदीप माथुर की पीठ ने निर्देश दिया कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना पार्षद मंजू के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। कोर्ट ने राज्य सरकार, जिला निर्वाचन अधिकारी और रिटर्निंग अधिकारी को नोटिस जारी कर 1 सप्ताह में जवाब मांगा है।
बीकानेर के याचिकाकर्ता को राहत: इसी पीठ ने बीकानेर से जुड़े याचिकाकर्ता मकसूद की गिरफ्तारी की आशंका वाले मामले में भी अंतरिम राहत प्रदान की।
श्रीगंगानगर और नागौर के कुचेरा में अध्यक्ष पद के प्रत्याशियों पर चुनाव प्रक्रिया के दौरान दर्ज मामलों में कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया।
संजय मूंदड़ा को 5 अक्टूबर तक स्टे: श्रीगंगानगर नगर परिषद के सभापति प्रत्याशी संजय मूंदड़ा 14 सितंबर को पार्षद चुने गए थे और 18 सितंबर को प्रत्याशी बने। 19 सितंबर को उनके खिलाफ परिवादी को धमकाने की FIR दर्ज हुई। न्यायाधीश कुलदीप माथुर की पीठ ने चुनाव की निकटता और FIR की टाइमिंग को देखते हुए उनकी गिरफ्तारी पर 5 अक्टूबर 2026 तक रोक लगा दी।
कुचेरा के तेजपाल मिर्धा को ACB केस में राहत: कुचेरा नगर पालिका के वार्ड 21 से निर्वाचित तेजपाल मिर्धा ने 16 सितंबर को अध्यक्ष पद का नामांकन भरा, जिसके तुरंत बाद 18 सितंबर की देर रात 11:58 बजे 2018 की एक पुरानी शिकायत पर ACB की एफआईआर दर्ज की गई। कोर्ट ने 8 साल पुरानी जांच पर अचानक चुनाव के बीच धारा 17-ए के तहत मिली मंजूरी के औचित्य पर सवाल उठाते हुए मिर्धा की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।
श्रीविजयनगर से सभापति पद के दावेदार सुशील मिड्ढा उर्फ बिट्टू मिड्ढा के मामले में भी हाईकोर्ट से बड़ी राहत सामने आई है।
19 सितंबर को दर्ज हुआ था मुकदमा: 14 सितंबर को वार्ड सदस्य और 18 सितंबर को प्रत्याशी घोषित होने के बाद सुशील मिड्ढा के खिलाफ 19 सितंबर को BNS और SC-ST एक्ट की गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
सरकारी पक्ष का विरोध खारिज: सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से आरोपों की गंभीरता का हवाला देते हुए राहत देने का विरोध किया गया, लेकिन न्यायाधीश सुनील बेनीवाल की पीठ ने चुनाव प्रक्रिया के मद्देनजर याचिकाकर्ता को 7 अक्टूबर 2026 तक गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दे दिया।
राजस्थान के प्रशासनिक और कानूनी इतिहास में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जब किसी स्थानीय निकाय चुनाव के सिलसिले में रविवार के दिन देर रात 10:30 बजे तक उच्च न्यायालय के दरवाजे खुले रहे हों।
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट के इन अंतरिम आदेशों से न केवल प्रत्याशियों को तत्काल राहत मिली है, बल्कि यह संदेश भी गया है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी भी दुर्भावनापूर्ण प्रशासनिक या पुलिस कार्रवाई के जरिए जनप्रतिनिधियों के लोकतांत्रिक मताधिकार को छीना नहीं जा सकता। अब सोमवार को होने वाले निकाय प्रमुखों के चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष माहौल में संपन्न होने की उम्मीद जताई जा रही है।