
Rajasthan High Court : राजस्थान में पंचायत और निकाय का कार्यकाल पूरा होने के बावजूद चुनाव नहीं होने से प्रदेश की ग्रामीण और शहरी सरकार कागजों तक सीमित होकर रह गई है। हाईकोर्ट 31 जुलाई तक चुनाव कराने के आदेश दे चुका है, लेकिन चुनाव की तारीख तय करने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की अधिसूचना का इंतजार है। राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पहले ओबीसी आरक्षण तय होगा, उसके बाद ही अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला आरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर पंचायत और निकाय चुनाव कब होंगे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने पिछले वर्ष नवंबर में 15 अप्रैल तक पंचायत-निकाय चुनाव कराने की डेडलाइन तय की थी, लेकिन सरकार ने डेडलाइन से पहले समय बढ़ाने का आग्रह किया और राहत प्राप्त कर ली। इसके बाद कोर्ट ने 31 जुलाई तक चुनाव कराने की नई डेडलाइन तय की। इसके बावजूद चुनावी प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में ही दिखाई दे रही है।
राज्य निर्वाचन आयोग, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग और राज्य सरकार सभी चुनावी प्रक्रिया को लेकर गेंद एक-दूसरे के पाले में डाल रहे हैं। इधर, हाईकोर्ट आदेश के बावजूद चुनाव नहीं कराने को लेकर पूर्व विधायक संयम लोढ़ा व अन्य की ओर से अवमानना याचिका दायर की जा चुकी। इसमें राज्य निर्वाचन आयुक्त व आयोग के सचिव पर कार्रवाई का आग्रह किया गया है। हाईकोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई जारी है।
राज्य निर्वाचन आयोग : मतदाता सूची जारी कर चुका है। एक जून को पंचायती राज और स्वायत्त शासन विभाग से एससी, एसटी, ओबीसी और महिला आरक्षण संबंधी जानकारी मांगी।
अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग : 4 जून को सभी जिला कलक्टरों से ओबीसी परिवारों के सर्वे के लिए कार्मिकों की अपडेट सूचना मांगी।
राज्य सरकार : निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर कहा कि ओबीसी आरक्षण तय होने के बाद ही एससी, एसटी और महिला आरक्षण निर्धारित किया जा सकेगा। ओबीसी आयोग से जल्द आरक्षण निर्धारण कर रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा है।
आम आदमी के लिए पंचायत-शहरी निकाय महत्वपूर्ण हैं। जब संसद-विधानसभा के चुनाव नहीं टाले जा सकते तो पंचायत निकाय चुनाव भी नहीं। चुनाव इम्तिहान की तरह है, इम्तिहान कौन देना चाहता है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, केरल, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में भी ऐसे हालात बने। पंजाब में सरकार ने संसाधन नहीं दिए, तब आयोग ने बैलट बॉक्स से चुनाव कराए। हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद चुनाव कराए, क्या यहां भी फटकार का इंतजार है। चुनाव कराना आयोग का दायित्व है, उसे सरकार पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
मधुकर गुप्ता, पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त
पंचायत और निकाय चुनाव समय पर नहीं होना अपने आप में असंवैधानिक स्थिति है। असमंजस खत्म करने के लिए अब अदालत को संवैधानिक प्रावधानों की पालना सुनिश्चित करानी चाहिए।
इंद्रजीत खन्ना, पूर्व मुख्य सचिव एवं पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त