जयपुर

राजस्थान के 3 पंचायतों में बड़ा उलटफेर, दोबारा आरक्षण लॉटरी निकालने के आदेश, सामने आई बड़ी वजह

Rajasthan Panchayat Election 2026 : तीनों प्रभावित ग्राम पंचायतों में बिल्कुल नए सिरे से आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा और नए सिरे से पारदर्शी तरीके से लॉटरी निकाली जाएगी। प्रशासन के लिए यह चुनौती होगी कि वह तय समय-सीमा में इस प्रक्रिया को पूरा करे, ताकि आगामी मतदान और नामांकन की तिथियों पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
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Oct 04, 2026
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राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के आगामी चुनावों के शंखनाद के साथ ही प्रशासनिक और कानूनी हलचल तेज हो गई है। चुनाव की तारीखों के ऐलान और आचार संहिता लागू होने के बीच राजस्थान हाईकोर्ट ने भरतपुर और करौली जिलों की तीन प्रमुख ग्राम पंचायतों में आरक्षण की लॉटरी और उससे जुड़ी अधिसूचनाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है जो पुरानी आरक्षण व्यवस्था के आधार पर अपनी चुनावी तैयारियों में जुटे थे। हाईकोर्ट की एकलपीठ के न्यायाधीश आनंद शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि केवल कागजी और गणितीय सटीकता को संवैधानिक और वैधानिक योजना का पूर्ण अनुपालन नहीं माना जा सकता है।

अदालत के इस कड़े रुख के बाद संबंधित जिला प्रशासनों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि आचार संहिता के इस दौर में अब इन पंचायतों में नए सिरे से प्रक्रिया पूरी करनी होगी। न्यायालय ने अपने आदेश में निर्देश दिया है कि निर्धारित नियमों और सर्कुलर के मुताबिक अगले सात दिनों के भीतर फिर से आरक्षण की प्रक्रिया अपनाई जाए और नए सिरे से लॉटरी निकाली जाए।

जिन तीन ग्राम पंचायतों की लॉटरी रद्द की गई है, उनमें भरतपुर जिले की पंचायत समिति उच्चैन के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बरीघा तथा करौली जिले की हिंडौन तहसील की ग्राम पंचायत श्री महावीर जी और अकबरपुर शामिल हैं।

क्या है पूरा कानूनी मामला और क्यों रद्द हुई लॉटरी?

यह पूरा कानूनी विवाद रविंद्र सिंह व अन्य की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट में दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सामने आया है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह तथ्यात्मक पक्ष रखा था कि जिला प्रशासन द्वारा 24 सितंबर 2026 को सरपंच पदों के लिए जो आरक्षण लॉटरी निकाली गई थी, उसमें रोटेशन (चक्रानुक्रम) के स्थापित नियमों की अनदेखी की गई थी।

उदाहरण के तौर पर, प्रभावित पंचायतों के पिछले चुनावी इतिहास को देखें तो वहां पिछले 7 चुनावों में से 3 बार एक ही वर्ग विशेष (विशेषकर अनुसूचित जाति - SC) को लगातार प्रतिनिधित्व दे दिया गया था, जिससे आरक्षण का संवैधानिक चक्र टूट गया।

इस मामले पर गहरी नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने माना कि यह प्रक्रिया राजस्थान पंचायती राज अधिनियम के तय प्रावधानों के बिल्कुल विपरीत है। अदालत ने यह साफ कर दिया कि स्थानीय निकायों में आरक्षण का उद्देश्य समाज के हर वर्ग को समान अवसर देना है, जो कि केवल औपचारिकता पूरी करने से पूरा नहीं होता।

इसी कानूनी खामी और मनमानी के चलते अदालत ने बरीघा, श्री महावीर जी और अकबरपुर पंचायतों की सरपंच आरक्षण लॉटरी को तुरंत प्रभाव से निरस्त करने का आदेश पारित किया।

क्या है नियम-7 और इसका महत्व?

हाईकोर्ट ने अपने इस महत्वपूर्ण आदेश में जिस नियम-7 (Rule 7) और संबंधित सरकारी सर्कुलर का मुख्य रूप से हवाला दिया है, वह राजस्थान पंचायती राज (निर्वाचन) नियम के तहत आरक्षण और चक्रानुक्रम प्रणाली को नियंत्रित करता है। इस नियम के कानूनी पहलू स्पष्ट हैं:

चक्रानुक्रम का सिद्धांत: नियम-7 यह पुख्ता तौर पर सुनिश्चित करता है कि पंचायती राज संस्थाओं में कोई भी सीट या सरपंच का पद किसी एक विशेष वर्ग (जैसे SC, ST, OBC या महिलाएं) के लिए लगातार आरक्षित न रहे।

नियमित बदलाव: इस व्यवस्था के तहत हर चुनाव में सीटों का आरक्षण एक निश्चित वैज्ञानिक और कानूनी फार्मूले के तहत 'रोटेट' (बदलना) होना चाहिए, ताकि समाज के सभी वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का समान अवसर मिल सके।

मनमानी पर रोक: यदि प्रशासनिक स्तर पर अधिकारी केवल जनसंख्या के आंकड़ों की सतही 'गणितीय गणना' करके बार-बार एक ही सीट को आरक्षित श्रेणी में डाल देते हैं, तो वह रोटेशन की मूल भावना का खुला उल्लंघन माना जाता है। हाईकोर्ट ने इसी प्रशासनिक चूक को अवैध ठहराया है।

चूक किसकी? इलेक्शन कमीशन या जिला प्रशासन?

तकनीकी रूप से इसे राज्य निर्वाचन आयोग की 'चूक' नहीं, बल्कि 'प्रशासनिक स्तर की गलती' कहा जाएगा। अक्सर आम लोगों में यह भ्रम होता है कि चुनाव से जुड़ी हर गतिविधि सीधे मुख्य चुनाव आयोग करता है, लेकिन पंचायती राज चुनावों में आरक्षण और लॉटरी की पूरी जिम्मेदारी जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों की होती है।

इस पूरे घटनाक्रम को अगर प्रशासनिक और कानूनी चश्मे से देखें, तो इसके जिम्मेदार और इसके पीछे की वजहों को समझा जा सकता है:

'आयोग' की नहीं, 'जिला प्रशासन' की चूक !

राजस्थान पंचायती राज नियमों के अनुसार, चुनाव से पहले किस पंचायत में कौन सा आरक्षण (SC, ST, OBC, General या महिला) लागू होगा, इसकी लॉटरी निकालने का काम जिला कलेक्टर और जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के मार्गदर्शन में राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

राज्य निर्वाचन आयोग केवल चुनाव की तारीखों की घोषणा करता है और आचार संहिता की निगरानी करता है।

भरतपुर और करौली के जिला प्रशासन ने लॉटरी निकालते समय नियम-7 (चक्रानुक्रम/रोटेशन) के जमीनी नियमों को ठीक से लागू नहीं किया, जिसके कारण यह कानूनी गलती हुई और मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

प्रशासन से कहाँ गलती हुई?

जैसा कि न्यायाधीश आनंद शर्मा ने अपने फैसले में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा: "केवल गणितीय सटीकता को संवैधानिक और वैधानिक योजना का अनुपालन नहीं माना जा सकता।" जिला प्रशासन के अधिकारियों ने केवल जनसंख्या के आंकड़ों को देखा। उन्होंने सोचा कि जिस पंचायत में जिस वर्ग की आबादी ज्यादा है, उसे तकनीकी रूप से आरक्षित कर दिया जाए।

वे यह भूल गए कि संविधान और नियम-7 का मूल उद्देश्य 'रोटेशन' (चक्रानुक्रम) है, ताकि हर चुनाव में अलग-अलग वर्गों को मौका मिले। एक ही सीट को बार-बार एक ही श्रेणी के लिए आरक्षित रखना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ था, जिसे अधिकारियों ने नजरअंदाज कर दिया।

अब 7 दिन में नए सिरे से लॉटरी

राजस्थान में पंचायती राज चुनावों को लेकर पहले ही आचार संहिता प्रभावी हो चुकी है, इसलिए हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद जिला प्रशासन की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग और भरतपुर एवं करौली के जिला कलेक्टर्स को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे आदेश जारी होने के ठीक सात दिनों के भीतर नियम-7 की पूरी पालना सुनिश्चित करें।

इसके तहत अब इन तीनों प्रभावित ग्राम पंचायतों में बिल्कुल नए सिरे से आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा और नए सिरे से पारदर्शी तरीके से लॉटरी निकाली जाएगी। प्रशासन के लिए यह चुनौती होगी कि वह तय समय-सीमा में इस प्रक्रिया को पूरा करे, ताकि आगामी मतदान और नामांकन की तिथियों पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।