
Panchayat Elections : प्रतीकात्मक फोटो एआइ से बनाया है।
राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 3 अक्टूबर 2026 को पंचायती राज चुनावों का शंखनाद कर दिया गया है। 14,403 ग्राम पंचायतों में आचार संहिता लागू हो चुकी है और चारों तरफ चुनावी बिसात बिछने लगी है। लेकिन इस बार का यह महामुकाबला ग्रामीण राजनीति के सबसे अहम पद- यानी 'सरपंच' के प्रत्याशियों के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है। दरअसल, आयोग द्वारा जारी चुनावी कार्यक्रम के बारीक कानूनी पन्नों को पलटने पर एक ऐसी जमीनी हकीकत सामने आई है, जिसने उम्मीदवारों की नींद उड़ा दी है। तकनीकी नियमों के जाल के कारण सरपंच उम्मीदवारों को आधिकारिक चुनाव चिह्न (सिंबल) आवंटित होने के बाद प्रचार के लिए 24 घंटे से भी कम यानी महज कुछ घंटों का समय मिल रहा है। इसे लेकर सोशल मीडिया से लेकर चौपालों तक ऐतराज जताया जा रहा है और आयोग से कार्यक्रम में पुनर्विचार की मांग उठ रही है।
आमतौर पर किसी भी चुनाव में उम्मीदवारों को पर्चा वापस लेने और सिंबल मिलने के बाद कम से कम एक सप्ताह का समय प्रचार के लिए मिलता है। जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के मामले में ऐसा ही हो रहा है, लेकिन सरपंचों के लिए यह पूरी गणित ही उल्टी पड़ गई है।
8 अक्टूबर 2026: जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा लोक सूचना जारी की जाएगी।
22 अक्टूबर 2026: मतदान दलों का जिला मुख्यालयों से गांवों की ओर प्रस्थान होगा।
23 अक्टूबर 2026: जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए ईवीएम (EVM) के जरिए पहले चरण का मतदान होगा।
24 अक्टूबर 2026 (सुबह 10:00 से दोपहर 1:00 बजे): आपके गांव के पोलिंग बूथ (जैसे सरकारी स्कूल) पर सरपंच उम्मीदवारों के नामांकन पत्र दाखिल किए जाएंगे।
24 अक्टूबर 2026 (दोपहर 3:00 बजे के बाद): नाम वापसी की समय सीमा समाप्त होते ही फाइनल उम्मीदवारों को आधिकारिक चुनाव चिह्न (जैसे अलमारी, उगता सूरज, चश्मा, बल्ला) बांटे जाएंगे।
25 अक्टूबर 2026 (सुबह 07:00 बजे): सरपंच पद के लिए मतपत्र (Ballot Paper) से वोटिंग शुरू हो जाएगी!
गणित साफ है: एक सरपंच प्रत्याशी को 24 अक्टूबर की शाम 4 बजे पता चलता है कि उसका चुनाव चिह्न 'बल्ला' या 'अलमारी' है, और अगले ही दिन 25 अक्टूबर को सुबह 7 बजे जनता वोट डालने पहुंच जाती है। यानी अधिकारिक सिंबल लेकर वोटर को समझाने के लिए प्रत्याशी के पास सिर्फ 24 अक्टूबर की रात का ही समय बचता है।
इस प्रशासनिक विसंगति और चौतरफा उठ रहे सवालों पर राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थिति स्पष्ट की। आयुक्त के अनुसार, ''सरपंच के चुनाव में शिकायतें आती हैं कि काफी पैसा खर्च होता है। मतदाताओं को प्रलोभन देने या उनपर अनुचित प्रभाव डालने की कोशिश होती है। इसके लिए ये तय किया गया है कि आज फॉर्म भरा जाएगा और कल वोटिंग होगी। जैसे मानलीजिये किसी पंचायत में अगर किसी पर्टिकुलर वर्ग के लिए सरपंच पद आरक्षित हो गया, तो चुनाव प्रचार तो हल्का-फुल्का अभी से कर रहे हैं,लेकिन उस बीच में हम लोगों ने समय नहीं दिया है ताकि जो धन बल का या जन बल का दुरुपयोग होता है उसे नियंत्रित किया जा सके। जिसकी पाक साफ़ छवि होगी और जो धरातल पर एक्टिव होगा, लोगों के बीच जिसका व्यवहार बढ़िया होगा तो उसे निश्चित रूप से फाइदा मिलेगा।''
इस तकनीकी पेच ने ग्रामीण वोटरों और उम्मीदवारों दोनों को उलझा दिया है। गांवों में साक्षरता की स्थिति को देखते हुए, बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे मतदाता अक्सर नाम के बजाय 'निशान' (सिंबल) पर ठप्पा लगाते हैं। ऐसे में मात्र एक रात में पूरे गांव को अपना नया सिंबल रटवाना उम्मीदवारों के लिए पहाड़ तोड़ने जैसा है।
सिंबल मिलने के भरोसे बैठने के बजाय उम्मीदवारों ने आचार संहिता लागू होते ही (3 अक्टूबर से) अनौपचारिक प्रचार शुरू कर दिया है। उम्मीदवार अपने नाम, चेहरे, जातिगत समीकरणों और व्यक्तिगत संबंधों के दम पर घर-घर जाकर धोक लगा रहे हैं। सोशल मीडिया (जैसे वॉट्सऐप ग्रुप और फेसबुक) पर बिना निशान के ही पोस्टर्स की बाढ़ आ गई है।
विभिन्न पंचायती राज संगठनों और सोशल मीडिया मंचों पर इस तंग समय-सारणी का खुलकर विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया पर आयोग से यह आग्रह किया जा रहा है कि भले ही प्रक्रिया को दो दिन और आगे बढ़ाया जाए, लेकिन सरपंच उम्मीदवारों को सिंबल आवंटन के बाद कम से कम 3 से 4 दिन का समय अवश्य दिया जाए ताकि वे सुचारू रूप से लोकतांत्रिक तरीके से अपना प्रचार कर सकें।
अब देखना यह होगा कि क्या राज्य निर्वाचन आयोग इस जनभावना और उम्मीदवारों की व्यावहारिक समस्या को देखते हुए कार्यक्रम में कोई आंशिक संशोधन करता है, या फिर इस बार राजस्थान के सरपंचों की किस्मत का फैसला 'एक रात के प्रचार' वाले इसी हाइब्रिड मॉडल से ही तय होगा!
Updated on:
04 Oct 2026 01:31 pm
Published on:
04 Oct 2026 12:24 pm
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