कानून होते हुए भी पढ़ाई से वंचित किए जा रहे दिव्यांग बच्चे
अब्दुल बारी/जयपुर। दिव्यांग बच्चों की शिक्षा को लेकर कानून भले ही स्पष्ट हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। शहर के कई सरकारी और निजी स्कूल आज भी दिव्यांग विद्यार्थियों को पढ़ाने में आनाकानी कर रहे हैं। कहीं बच्चों को पढ़ते-पढ़ते स्कूल बदलने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो कहीं विशेष शिक्षक उपलब्ध कराने से साफ इनकार किया जा रहा है। इसका सीधा असर इन बच्चों के भविष्य के साथ-साथ उनके माता-पिता के मानसिक और सामाजिक संघर्ष पर पड़ रहा है।
केस 1: पढ़ रहा बच्चा, स्कूल बदलने का दबाव
प्रताप नगर निवासी कैलाश चौधरी का बौद्धिक दिव्यांग बेटा सेक्टर-6 स्थित महात्मा गांधी विद्यालय में कक्षा 8 में पढ़ रहा है। पिता का कहना है कि स्कूल में विशेष शिक्षक की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में बच्चा पढ़ाई में पिछड़ता नजर आ रहा है। जब उन्होंने बार-बार इस मांग को उठाया तो स्कूल स्टाफ ने समाधान देने के बजाय बच्चे का स्कूल बदलने की सलाह दे दी।
केस 2: एडमिशन के दरवाजे ही बंद
वैशाली नगर निवासी सरीता पारिक अपने ऑटिज्म से प्रभावित बेटे का एडमिशन निकट ही गिरिधारीपुरा स्थित एक निजी स्कूल में कराना चाहती थीं। लेकिन स्कूल प्रशासन ने दो टूक कह दिया कि वे ऐसे बच्चों को एडमिशन नहीं देते। सरीता ने बताया कि उन्होंने स्कूल में कई बार संपर्क किया और समझाने की कोशिश की, लेकिन हर बार स्कूल ने अन्य स्कूल तलाशने की सलाह दी।
केस 3: मजबूरी में दूर कराया एडमिश्न
मानसरोवर निवासी बबीता वर्मा का 7 वर्षीय बेटा ऑटिज्म प्रभावित है। वह किरण पथ स्थित एक निजी स्कूल में उसका एडमिशन कराना चाहती थीं। शुरुआती बातचीत के बाद जैसे ही स्कूल प्रशासन को बच्चे की स्थिति की जानकारी हुई, तो स्कूल एडमिशन से पीछे हट गया। अंततः बबीता को मजबूरी में घर से दूर एक दूसरे स्कूल में बच्चे का दाखिला कराया है।
अधिनियम क्या कहता है
दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 16 के अनुसार मान्यता प्राप्त सभी शैक्षणिक संस्थानों को दिव्यांग बच्चों को समावेशी शिक्षा देना जरूरी है। इसके तहत स्कूलों को विशेष शिक्षकों की व्यवस्था समेत अन्य सुविधाएं उपलब्ध करानी होती हैं। वहीं धारा 31 कहती है दिव्यांगता वाले बच्चों को अपनी पसंद के मुताबिक और नजदीकी स्कूल में पढ़ने का अधिकार देती है।
…कड़ी कार्यवाही की जरुरत
शहरभर में 40 से 50 इस तरह के मामले हैं। बड़ा सवाल यह है कि जब कानून मौजूद है, तो उसका पालन क्यों नहीं हो रहा। शिक्षा विभाग की निगरानी और कार्रवाई कहां है। दिव्यांग बच्चों की शिक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार है। जिम्मेदारों को इन मामलों में कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए। ताकि ऐसे मामलों का दोहराव न हो।
प्रतिभा भटनागर, फाउंडर
सपोर्ट फाउंडेशन फॉर ऑटिज्म एंड डेवलपमेंटल डिसेबिलिटीज